गायत्री का अर्थ चिन्तन

ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

ऊँ ब्रह्म भू:— प्राणस्वरूप , भुव:— दु:खनाशक , स्व:— सुख स्वरूप ,
तत्— उस , सवितु:— तेजस्वी, प्रकाशवान् ,वरेण्यं— श्रेष्ठ
भर्गो— पापनाशक , देवस्य— दिव्य को, देने वाले को , धीमहि— धारण करें ,
धियो— बुद्धि को , यो— जो, न:— हमारी प्रचोदयात् करे।

गायत्री मन्त्र के इस अर्थ पर मनन एवं चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्त्वों की वृद्धि होती है, जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। यह भाव बड़े ही शक्तिदायक, उत्साहप्रद, सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्यप्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।

गायत्री साधना से शक्तिकोशों का उद्भव

गायत्री कोई देवी- देवता, भूत- पलीत आदि नहीं, वरन् ब्रह्म की स्फुरणा से उत्पन्न हुई आद्यशक्ति है, जो संसार के प्रत्येक पदार्थ का मूल कारण है और उसी के द्वारा जड़- चेतन सृष्टि में गति, शक्ति, प्रगति- प्रेरणा एवं परिणति होती है। 

जैसे घर में रखे हुए रेडियो यन्त्र का सम्बन्ध विश्वव्यापी ईथर तरंगों से स्थापित करके देश- विदेश में होने वाले प्रत्येक ब्राडकास्ट को सरलतापूर्वक सुन सकते हैं, उसी प्रकार आत्मशक्ति का विश्वव्यापी गायत्री शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करके सूक्ष्म प्रकृति की सभी हलचलों को जान सकते हैं; और सूक्ष्म शक्ति को इच्छानुसार मोड़ने की कला विदित होने पर सांसारिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र में प्राप्त हो सकने वाली सभी सम्पत्तियों को प्राप्त कर सकते हैं। 

जिस मार्ग से यह सब हो सकता है, उसका नाम है- साधना।

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संरक्षक संस्थापक

एक सन्त, युगपुरुष, दृष्टा, सुधारक आचार्य श्रीराम शर्मा जिन्होने युग निर्माण योजना आन्दोलन का सूत्रपात किया। जिन्होने तपस्या का अनुशासित जीवन जीते हुए आध्यात्मिक श्रेष्ठता प्राप्त कर समस्त मानवता को प्रेरित किया । जिन्होने बदलते समय के अनुसार हमारे दृष्टिकोण को, विचारों को, संवेदनशीलता का विस्तार करने के लिये, जीवन को बदलने के लिये सत्साहित्य का सृजन किया ।

परम पूज्य गुरुदेव एक ऐसे साधक, द्रष्टा, विचारक रहे हैं, जिनको व्यक्ति, परिवार, समाज और देश-विदेश में घट रही अथवा घटने वाली घटनाओं की तह में जाकर उन्हें आर-पार देखने की अलौकिक सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त थी। जो दृश्य-अदृश्य जगत् की विविध परिस्थितियों को निमिष मात्र में भाँपकर उन्हें नियन्त्रित कर लेते थे।

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वास्तव में दुर्लभ और व्यावहारिक लेखन गायत्री मंत्र, साधना और यज्ञ विज्ञान पर .

अद्वितीय आंदोलनविचार क्रांति के पहले ही मुद्दे के साथ "अखण्ड ज्योति " 1939 में पहली पुस्तक में उन्होंने लिखा था "में क्या हूँ ? ", वास्तविक में एक उपनिषद स्तर के काम आत्म के ज्ञान पर ।

पूरा ग्रंथ, हिन्दी, पूरे वैदिक इंजील (वेद, उपनिषद, दर्शन , पुराण और स्मृति की )

प्रमुख पुस्तकालयों द्वारा मान्यता : इन्क्लूडिंग आई .आई.टी मुम्बई , स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया , सिडनी यूनिवर्सिटी ,वेस्टर्न रेलवे हिंदी डिवीज़न -मुम्बई , भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट -पुणे

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