लहसुन

    
इसके आन्तरिक प्रयोगों का प्रतिपादन तो इस पुस्तक में नहीं है; क्योंकि अध्यात्म प्रयोजन से ही सही, औषधि प्रयोजन से भले न हो इसके तमोगुणी अंतरंग प्रभावों के कारण इसे सात्विक आहार नहीं माना जाता है, पर बाहरी उपचार की दृष्टि से यह एक उत्तम श्रेष्ठ औषधि है, इसके विषय में दो मत नहीं हो सकते । 'लशति छिंनति रोगान लशुनम्' अर्थात् जो रोग का ध्वंस करे उसे लहसुन कहते हैं । इसे रगोन् भी कहते हैं ।

यह कुछ-कुछ प्याज से मिलता-जुलता पौधा है, जिसके पौधे कोमल-कोमल काण्ड युक्त 30 से 60 सेण्टीमीटर लम्बे होते हैं । पत्तियाँ चपटी, पतली होती हैं व इनको मसलने पर एक प्रकार की उग्र गंध आती है । पुष्प दण्ड काण्ड के बीच से निकलता है, जिसके शीर्ष पर गुच्छेदार सफेद फूल लगते हैं । कन्द श्वेत या हल्के गुलाबी रंग के आवरण से ढँका होता है, जिसमें 5 से 12 छोटे-छाटे जौ के आकार के कन्द होते हैं । इन्हें कुचलने से तीव्र अप्रिय गंध आती है । सुर्ख शीतल स्थानों पर जहाँ हवा का समुचित प्रवेश होता हो इन्हें 6 मास तक सुरक्षित रखकर प्रयोग में लाया जा सकता है ।

डॉ. नादकर्णी के अनुसार लहसुन का तेल लिनिमेण्ट व पुल्टिस सभी लाभप्रद होते हैं । बाह्य प्रयोगों में यह कड़ी गाँठ को गला देता है । वात रोगों में व लकवे में इसका बाह्य लाभ करता है । इसका लेप दमा, गठिया, सियाटिका चर्म रोगों तथा कुष्ठ में करते हैं । स्वरस में नमक मिलाकर नीलों (ब्रूस) व मोच (स्प्रेन) में सूजन उतारने हेतु प्रयुक्त करते हैं । यह कर्णशूल के लिए भी प्रयुक्त होता है ।

दाद, विशेषकर, रिंगवर्म जैसे फंगल संक्रमणों में यह लाभकारी है । सड़े-गले व्रणों पर लगाने में लहसुन प्रति संक्रामक का कार्य करती है तथा घाव भरने में मदद करती है । डॉ. विष्णु प्रसाद मुखर्जी के अनुसार लहसुन की पुल्टिस को किसी भी सूजे भाग पर बाँधने या ताजा स्वरस रगड़ने से सूजन मिटती है ।
श्री दस्तूर के अनुसार पेशाब रुकने पर पेट के निचले भाग में लहसुन की पुल्टिस बाँधने से मूत्राशय की निषक्रियता दूर होती है । हकीम दलजीतसिंह के अनुसार लहसुन बाह्यतः लेपन और विलयन है । इसे पीसकर, एण्टीबायोटिक क्रीम की तरह लगाते हैं व अधपकी फुन्सियों को पकाने के लिए भी प्रयुक्त करते हैं ।

रासायनिक दृष्टि से इसका उत्पत तेल संघटक-ऐलिन प्रोपाइल डाइसल्फाइड व दो अन्य गंधक युक्त यौगिक मुख्य भूमिका निभाते हैं । मेडीसिनल प्लाण्ट्स ऑफ इण्डिया के अनुसार लहसुन में पाया जाने वाला एलीन नामक जैव सक्रिय पदार्थ एक प्रचण्ड जीवाणुनाशी है । औषधि के 20 से 25 प्रतिशत घोल की जीवाणुनाशी क्षमता कार्बोलिक अम्ल से दो गुनी है । इसके बावजूद यह स्वस्थ ऊतकों को कोई हानि नहीं पहुँचाती । व्रणों पर इसे बिना किसी हानि के प्रयुक्त किया जा सकता है ।
डॉ. अरुणाचलम् के अनुसार लहसुन का जल निष्कर्ष (जियोवायोस-7.01, 1980) स्ट्रेप्टोकोकस फीकेलिस एवं इन कोलाय के विरुद्ध सामर्थ्य रखता है । कवकों की वृद्धि भी यह रोकता है ।

व्यावहारिक प्रयोग में संधिवात गुधसी, शोथ वेदना प्रधान रोगों में लहसुन के तेल से मालिश करते हैं । पार्श्वशूल में इसके कल्क का लेप व स्वरस की मालिश करते हैं । खुजली, दाद में भी लहसुन के तेल का लेप आराम देता है । पक्षाघात में इसके अभिमर्दन से माँसपेशियों के पुनः सक्रिय होने की संभावनाएँ बढ़ती है । साँप तथा बिच्छू के काटे पर लहसुन की ताजी कलियाँ पीसकर लगाएँ । जहाँ तक जहर चढ़ गया हो, वहाँ तक इस लेप को लगाकर पट्टी बाँध देने से जहर उतर जाता है ।

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