गायत्री महामंत्र के भावों की महत्ता अद्भुत- अनुपम एवं शब्दों से परे है

'गायत्री मंत्र के भावपूर्ण जप का प्रभाव सूक्ष्म जगत में तत्काल परिलक्षित होता है। अनन्त आकाश से दिव्य ऊर्जा का किरण पुंज साधक के शरीर पर अवतरित होता दिखता है। वह दिव्य प्रकाश साधक के सामने की ओर शंकु (कोनिकल) आकार में एक प्रकाशमान बिन्दु पर केन्द्रित(फोकस) हो जाता है। उसका प्रभाव क्षेत्र साधक के स्तर के अनुरूप कम- अधिक होता है। लगता है कि यह प्रकाश बिन्दु सद्भाव एवं सद्विचार संचारक होता है। उसके प्रभाव क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति आ जाता है तो वह प्रकाश पुंज मुड़कर उस व्यक्ति के हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श करता है।

यदि गायत्री मंत्र का भाषानुवाद किसी भी भाव में किया जाए तो उसके जप से भी इसी प्रकार का प्रभाव परिलक्षित होता है। संस्कृत भाषा में मूल मंत्र के प्रभाव से उस प्रकाश पुंज के चारों ओर प्रकाश की कलात्मक संरचना विशेष रूप से दिखती है।


नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण (युग परिवर्तनकारी महाअनुष्ठान)

एक विलक्षण आध्यात्मिक पुरूषार्थ ( नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण) की घोषणा अपने इस विराट गायत्री परिवार के लिए सूक्ष्म जगत से हुई है । 1943 से 1994 तक स्थूल रूप से गायत्री परिवार के संरक्षक के रूप में परम पूज्य गुरुदेव की अभिन्न परम वंदनीया शक्तिस्वरूपा स्नेहसालिता माता भगवती देवी शर्मा जी ने अपने आराध्य पूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी के साथ एक अभूतपूर्व पुरूषार्थ संपन्न किया था । 1994 में अपनी आध्यात्मिक एवं स्थूल लीला को समेट कर वे अपने आराध्य की कारण सत्ता में व में विलीन हो गईं । 1926 में जन्मीं हमारी उसी मातृसत्ता की जन्मशताब्दी का प्रसंग समीप आ रहा है । 2026 में सितम्बर माह में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को उनके जन्म को एक शतक पूरा हो जायेगा । इस उपलक्ष्य में हम सभी उनके बालकों उनकी स्मृति में एक आध्यात्मिक महापुरूषार्थ नौ वर्ष तक सतत चलाते रहकर उसकी पूर्णाहुति 2026 में करने का संकल्प किया है ।

यह युग परिवर्तनकारी महाअनुष्ठान 9 जुलाई, गुरुपूर्णिमा 2017 से आरंभ होकर 29 जुलाई, गुरुपूर्णिमा 2026 को समाप्त होगा । इसमें करोड़ो परिजनों की भागीदारी होने जा रही है ।

कैसे इसे करना है; ताकि लक्ष्य पूर्ति तक हम पहुँच सकें? पढ़ें ..

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संरक्षक संस्थापक

एक सन्त, युगपुरुष, दृष्टा, सुधारक आचार्य श्रीराम शर्मा जिन्होने युग निर्माण योजना आन्दोलन का सूत्रपात किया। जिन्होने तपस्या का अनुशासित जीवन जीते हुए आध्यात्मिक श्रेष्ठता प्राप्त कर समस्त मानवता को प्रेरित किया । जिन्होने बदलते समय के अनुसार हमारे दृष्टिकोण को, विचारों को, संवेदनशीलता का विस्तार करने के लिये, जीवन को बदलने के लिये सत्साहित्य का सृजन किया ।

परम पूज्य गुरुदेव एक ऐसे साधक, द्रष्टा, विचारक रहे हैं, जिनको व्यक्ति, परिवार, समाज और देश-विदेश में घट रही अथवा घटने वाली घटनाओं की तह में जाकर उन्हें आर-पार देखने की अलौकिक सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त थी। जो दृश्य-अदृश्य जगत् की विविध परिस्थितियों को निमिष मात्र में भाँपकर उन्हें नियन्त्रित कर लेते थे।

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वास्तव में दुर्लभ और व्यावहारिक लेखन गायत्री मंत्र, साधना और यज्ञ विज्ञान पर .

अद्वितीय आंदोलनविचार क्रांति के पहले ही मुद्दे के साथ "अखण्ड ज्योति " 1939 में पहली पुस्तक में उन्होंने लिखा था "में क्या हूँ ? ", वास्तविक में एक उपनिषद स्तर के काम आत्म के ज्ञान पर ।

पूरा ग्रंथ, हिन्दी, पूरे वैदिक इंजील (वेद, उपनिषद, दर्शन , पुराण और स्मृति की )

प्रमुख पुस्तकालयों द्वारा मान्यता : इन्क्लूडिंग आई .आई.टी मुम्बई , स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया , सिडनी यूनिवर्सिटी ,वेस्टर्न रेलवे हिंदी डिवीज़न -मुम्बई , भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट -पुणे

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