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(५) जिस नथुने से साँस खींचा था, उसी बायें छिद्र से बाहर निकालिये और ध्यान कीजिए कि नाभिचक्र के चन्द्रमा को छूकर वापिस लौटने वाली प्रकाशवान् एवं शीतल वायु इड़ा नाड़ी की छिद्र नलिका को शीतल एवं प्रकाशवान् बनाती हुई वापिस लौट रही है ।
(६) कुछ देर साँस बाहर रोकिए और फिर उपरोक्त क्रिया आरम्भ कीजिए । बायें नथुने से ही साँस खींचिए और उसी से निकालिए । दाहिने छिद्र को अँगूठे से बन्द रखिए । इसी को तीन बार कीजिए ।
(७) जिस प्रकार बायें नथुने से पूरक, कुम्भक, रेचक, बाह्य कुम्भक किया था, उसी प्रकार दाहिने नथुने से भी कीजिए । नाभिचक्र में चन्द्रमा के स्थान पर सूर्य का ध्यान कीजिए और साँस छोड़ते समय भावना कीजिए कि नाभि स्थित सूर्य को छूकर वापिस लौटने वाली वायु श्वास नली के भीतर उष्णता और प्रकाश उत्पन्न करती हुई लौट रही है ।
(8) बायें नासिका स्वर को बन्द रखकर दाहिना छिद्र से भी इस क्रिया को तीन बार कीजिए ।
(9) अब नासिका के दोनों छिद्र खोल दीजिए । दोनों से साँस खींचिए और भीतर रोकिए और मुँह खोलकर साँस बाहर निकाल दीजिए । यह विधि एक बार ही करना चाहिए
तीन बार बायें नासिका छिद्र से साँस खींचते और छोड़ते हुए नाभि चक्र के चन्द्रमा का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से साँस खींचते छोड़ते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश वाला ध्यान, एक बार दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से साँस निकालने की क्रिया यह सात विधान मिलकर एक नाड़ी शोधन प्राणायाम बनता है ।
प्राणायाम के अभ्यासी के लिए कुछ सामान्य नियमों का पालन बहुत आवश्यक हैः-
1. प्राणायाम शुद्ध वायु में खुले स्थान में करें घर में करें तो कमरे की खिड़कियाँ खुली रहें और स्थान यथा सम्भव शान्त हो ।
2. प्राणायाम के समय शरीर में बहुत अधिक वस्त्र न लादें जायें ।
3. प्राणायाम के बाद वजनदार वस्तुयें न उठायें तथा स्वर्ण, चाँदी आदि धातुओं को छोड़कर कुचालक धातु जैसे लोहे आदि का स्पर्श न करें ।
4. तुरन्त पेट भर भोजन न करें हलका और सात्त्विक आहार ही इन दिनों ग्रहण किया जाए पर पानी बिना प्यास के भी दिन में बार-बार पियें ।
5. ब्रह्मचर्य व्रत का यथा सम्भव अधिक से अधिक पालन करना चाहिए ।
गायत्री उपासक का संकल्प जब प्राणायाम प्रक्रिया के साथ जुड़ता है, तो ब्रह्माण्ड व्यापी महाप्राण-तत्व उसकी ओर विशिष्ट रूप से प्रवाहित हो उठता है । साधक की आस्था के अनुरूप प्राणानुदान दयामयी की कृपा से प्राप्त होने लगते हैं । इस तरह प्राणायाम के अभ्यास से गायत्री उपासना से उपार्जित प्राण शक्ति की मात्रा द्रुत-गति से बढ़ती है और साधक को लौकिक, भौतिक एव आध्यात्मिक क्षमताओं से विभूषित कर देती है ।
(गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन पृ.12.45)
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