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कुण्डलिनी में षठ चक्र और उनका भेदन

    
नौ के वर्णन में भी नाम और स्थानों की भिन्नता मिलती है । एक स्थान पर उनके नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं-(१) ब्रह्म चक्र (२) स्वाधिष्ठान चक्र (३) नाभि चक्र (४) हृदय चक्र (५) कण्ठ चक्र (६) तालु चक्र (७) भूचक्र (८) निर्वाण चक्र (९) आकाश चक्र बताये गये हैं । यह उल्लेख सिद्ध सिद्धान्त पद्धाति में विस्तारपूर्वक मिलता है ।

संख्या जो भी मानी जाये उन सब का एक समन्वय शक्ति पुंज लोगोज (logos) भी है जिसकी स्थूल सूर्य के समान ही किन्तु अपने अलग ढंग की रश्मियाँ निकलती हैं । सूर्य किरणों में सात रंग अथवा ऐसी विशेषतायें होती हैं जिनका स्वरूप, विस्तार और कार्यक्षेत्र सीमित है । पर इस आत्मतत्त्व के सूर्य का प्रभाव और विस्तार बहुत व्यापक है । वह प्रकृति के प्रत्येक अणु को नियंत्रित एवं गतिशील रखता है साथ ही चेतन संसार की विधि व्यवस्था को सँभालता सँजोता है । इसे पाश्चात्य तत्व वेत्ता सन्स आफ फोतह (Sons of Fotah ) कहते हैं कि विश्वव्यापी शक्तियों का मानवीकरण इसी केन्द्र संस्थान द्वारा हो सका है ।

सामान्य शक्ति धाराओं में प्रधान गिनी जाने वाली (१) गति (२) शब्द (३) ऊष्मा (४) प्रकाश (५) (Electric Fluid) संयोग (६) विद्युत (७) चुम्बक यह सात हैं । इन्हें सात चक्रों का प्रतीक ही मानना चाहिए ।

कुण्डलिनी शक्ति को कई विज्ञानवेत्ता विद्युत द्रव्य पदार्थ (श्वद्यद्गष्ह्लह्म्द्बष् स्नद्यह्वद्बस्र) या नाड़ी शक्ति कहते हैं ।

इस निखिल विश्व ब्रह्मण्ड में संव्याप्त परमात्मा की छःचेतन शक्तियों का अनुभव हमें होता है । यों शक्ति पुञ्ज परब्रह्म की अगणित शक्ति धाराओं को पता सकना मनुष्य की सीमित बुद्धि के लिए असम्भव है । फिर भी हमारे दैनिक जीवन में जिनका प्रत्यक्ष संम्पर्क संयोग रहता है उनमें प्रमुख यह हैं- (१) परा शक्ति (२) ज्ञान शक्ति (३) इच्छा शक्ति (४) क्रिया शक्ति (५) कुण्डलिनी शक्ति (६) मातृका शक्ति (७) गुहृ शक्ति ।

इन सबकी सम्मिलित शक्ति पुञ्ज ईश्वरीय प्रकाश सूक्ष्म प्रकाश (Astral Light) कह सकते हैं । यह सातवीं शक्ति है कोई चाहे तो इस शक्ति पुञ्ज को उर्पयुक्त छःशक्तियों का उद्गम भी कह सकता है । इन सबको हम चैतन्य सत्ताएँ कह सकते हैं । उसे पवित्र अग्नि (Sacred Fire) के रूप में भी कई जगह वर्णित किया गया है और कहा गया है उसमें से आग ऊष्मा तो नहीं पर प्रकाश किरणें निकलती हैं और वे शरीर में विद्यमान ग्रंथियों ग्लैण्ड्स, केन्द्रों (Centres) और गुच्छकों को आसाधारण रूप से प्रभावित करती हैं । इससे मात्र शरीर या मस्तिष्क को ही बल नहीं मिलता वरन् समग्र व्यक्तित्व की महान सम्भावना को और अग्रसर करती हैं ।

इन सात चक्रों में अवस्थित सात उर्पयुक्त शक्तियों का उल्लेख साधना ग्रंथों में अलंकारिक रूप में हुआ है । उन्हें सात लोक, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात ऋषि आदि नामों से चित्रित किया गया है ।

इस चित्रण में यह संकेत है कि इन चक्रों में किन-किन स्तर के विराट् शक्ति स्रोतों के साथ सम्बन्ध है । बीज रूप में कौन महान सामर्थ्य इन चक्रों में विद्यमान है और जाग्रत होने पर उन चक्र संस्थानों माध्यम से मनुष्य का व्यक्तित्व छोटे से कितना विराट और विशाल हो सकता है । टोकरी भर बीज से लम्बा-चौड़ा खेत हरा-भरा हो सकता है । अपने बीज भण्डार में सात टोकरी भरा-सात किस्म का अनाज सुरक्षित रखा है ।

चक्र एक प्रकार के शीत गोदाम-कोल्डस्टोर है और इन ताला जड़ा हुआ है । इन सात तालों की एक ही ताली है उसका नाम है 'कुण्डलिनी' । जब उसके जागरण की जाती है । शरीर रूपी साढ़े तीन एकड़ के खेत में वह बोया जाता है । यह छोटा खेत अपनी सुसम्पन्नता को अत्यधिक व्यापक बना देता है ।

पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था । भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी । बलि तैयार हो गये । तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया ।

हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है । चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई-साढ़े तीन एकड़ जमीन न रहकर लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं ।

(सावित्री कुण्डलिनी एवं तन्त्र : पृ-6.24)
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