ऋषि परंपरा के पुनरुद्धार

शरीर की संरचना की दृष्टि से मानव प्राणी अन्य जीवधारियों में से कितनों से ही पिछड़ हुआ है। कितनी ही ऐसी विशेषताएँ क्षुद्र जीवों में पाई जाती हैं, जिनके सौभाग्य से आदमी को वंचित ही रहना पड़ता है। प्रकृति प्रकोपों को अन्य प्राणी जितना सह सकता है उतना मनुष्य के लिए शक्य नहीं। उसे परिधान पहनने और अच्छादन ढ़ूँढ़ने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, जबकि जीवधारियों में से असंख्यों को इसके बिना ही काम चलाते देखा जा सकता है। बुद्धिमत्ता की विशेषता ने ही उसे सुविधा- साधनों से भरा पूरा, प्रगतिशील और प्राणी जगत का मुकुटमणि बनाया है। यह बुद्धिमत्ता उसकी स्व उपार्जित है। आदर्शवादी सद्भावनाओं का ईश्वर प्रदत्त अनुदान ही उसे सहकारी उदार जीवन जीने की प्रेरणा देता रहा है और उसी आधार पर उसने क्रमिक विकास के मार्ग पर अग्रसर होते हुए बुद्धिमत्ता पाई है।

मानवी मौलिक विशिष्टता को अन्तरंग जीवन में उत्कृष्टता और बहिरंग क्षेत्र में शालीनता कहते हैं। इन्हीं दोनों को संस्कृति एवं सभ्यता के नामों से जाना जाता है। पुरातन भाषा में उत्कृष्ट चिन्तन को, संस्कृति को, अध्यात्म एवं उदार सहकारिता को, सद्व्यवहार को धर्म कहते हैं। वैसे इन दोनों को तत्वज्ञान, नीतिशास्त्र, ब्रह्म विद्या, धर्म धारणा आदि नाम भी दिये जाते रहे हैं। यदि इस सत्प्रवृत्ति का अभाव रहा होता तो मनुष्य प्राणी अपनी दुर्बल शारीरिक संरचना के कारण प्रकृति संघर्ष में कब का हार गया होता। जब महागज, महासरीसृप, महाव्याघ्र जैसे विशालकाय प्राणी अपने अस्तित्व की रक्षा न कर सके और प्रागैतिहासिक काल की गाथा मात्र बनकर रह गये तो निश्चय ही मनुष्य की दुर्बल काया कब की इस धरती से तिरोहित हो गई होती। बुद्धिमत्ता ने ही उसे जीवित और प्रगतिशील रखा है। इस तथ्य को वन्य क्षेत्र में रहने वाले पशु परम्परा अपनाये हुए मनुष्य की पिछड़ी स्थिति को देखते हुए आज भी जाना जा सकता है। सदाशयता ही वह विशेषता है, जिसने चिन्तन और चरित्र को ऊँचा उठाने और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने के वरदान उपलब्ध कराये हैं।

उत्कृष्टता का पक्षधर तत्वदर्शन और नीति निर्धारण ही अध्यात्म है। इसी को भौतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में राजतन्त्र और आत्मिक निर्धारण के सम्बन्ध में धर्मतन्त्र कहा गया है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक भी ऐसा नही है, जिसे दुर्बल होने दिया जाय। राजतन्त्र लड़खड़ाने लगे तो अराजकता फैलेगी और व्यवस्था तथा प्रगति का ढांचा लड़खड़ा जायेगा। इसी प्रकार धर्मतन्त्र पर अस्त- व्यस्तता छाई तो संयम, अनुशासन एवं सद्व्यवहार की रीति- नीति को जीवन्त न रखा जायेगा। मत्स्य न्याय का प्रचलन मानव समाज में चल पड़ा तो बुद्धिवादी आक्रामकता अन्ततः यादवी कलह उत्पन्न करेगी और परस्पर लड़कर समाप्त हो जाने की स्थिति बनेगी। न सुरक्षा दृष्टिगोचर होगी न निश्चिन्तता। चिन्तित और शंकाशील, कातर और आतंकित मनुष्य निर्वाह के साधन तक न जुटा सका तो बेमौत मारा जायेगा। राजतन्त्र और धर्मतन्त्र ही वे आधार हैं, जो भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों की सुव्यवस्था बनाये रहते हैं।

मध्यकालीन अन्धकार युग में भ्रान्तियों एवं विकृतियों ने सभी क्षेत्रों में प्रवेश किया उससे राजतन्त्र और धर्मतन्त्र जैसी व्यवस्थाएँ भी बेतरह लड़खड़ाई। राजतन्त्र के क्षेत्र में सामन्तवाद, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ घुसी और उस व्यवस्था को निहित स्वार्थों का, आपाधापी का क्षेत्र बनाकर रख दिया। जन साधारण ने उस कुचक्र में फँसकर सुरक्षा के स्थान पर त्रास ही पाया। धर्मतन्त्र की भी ऐसी ही दुर्गति हुई। उस क्षेत्र के अनुयायी मात्र भ्रम जंजालों में अपनी श्रद्धा एवं श्रम सम्पदा का अपव्यय करते रहते हैं। इसके विपरीत धर्मजीवी पुरोहितों को सम्मान एवं वैभव अर्जित करने का लाभ बिना किसी त्याग पुरुषार्थ के ही मिलता रहता है। प्रस्तुत परिस्थितियों को देखने से लगता है धर्म की आत्मा रुष्ट होकर कहीं अन्यत्र चली गई और अपना निष्प्राण कलेवर सड़न और दुर्गन्ध फैलाते रहने के लिए पड़ा छोड़ गई है।

नव जागरण की इस प्रभात बेला में आवश्यक परिवर्तन और उपयोगी निर्धारण हो रहा है। सभी क्षेत्र के शूरवीर अपने- अपने ढंग से प्रयास कर रहे हैं। जागरुकता और गतिशीलता, संघर्ष और कर्मठता जहाँ भी रहती है, वहाँ देर- सबेर में औचित्य तक पहुँचने का साधन बन जाता है। उस दृष्टि से राजतन्त्र का भविष्य आशाजनक है। असमंजस धर्मतन्त्र के सम्बन्ध में है। क्योंकि उस क्षेत्र में जागरुकता, कर्मनिष्ठा और प्रगतिशीलता की तीन आवश्यकताओं में से एक भी पूरी नहीं हो रही है। उस क्षेत्र की प्रतिभाएँ अपने निहित स्वार्थों से बेतरह चिपकी हुई हैं। न कहीं मार्टिन लूथर दीखते हैं न दयानन्द। गुरु गोविन्दसिंह और समर्थ रामदास जैसे सच्चे धर्म रक्षकों का अनुकरण भी कोई नहीं कर रहा है। ऋषि परम्परा की तो चर्चा ही क्या की जाय? सन्त और सुधारकों की पीढ़ी भी धीरे- धीरे बब्बर शेरों की तरह घटती विलुप्त होती चली जा रही है। राजतन्त्र में पीड़ित प्रजाजनों ने स्थान- स्थान पर, समय- समय पर विद्रोह किये और अन्धकार पाये, पर धर्मतन्त्र के समूचे क्षेत्र में कहीं वैसी हलचल भी दिखाई नहीं पड़ती। सर्वत्र श्मशान जैसी निस्तब्धता छाई हुई है। चमत्कार देखने और मनोकामना पूरी कराने की विडम्बना ही साधना सिद्धि का कलेवर ओढ़े जहाँ- तहाँ दिखाई पड़ती है। कर्मकाण्डों के खर्चीले ढकोसले भी धनीमानी लोगों को आगे करके जब तब खड़े किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त वैसा कुछ नहीं दीखता जिसमें धर्म को, आत्मा को जीवन्त स्थिति में देखा जा सके, जाना जा सके।

निकृष्टता अपनाने पर व्यक्तित्वों का स्तर गया गुजरा हो जाता है। प्रतिभाएँ जब भ्रष्टता और दुष्टता अपनाने पर उतारू होती हैं तो प्रगति का प्रवाह रुकता है और सन्तुलन लड़खड़ाता है। संक्षेप में विश्व- व्यवस्था में अवरोध उत्पन्न होने का कारण धर्मतन्त्र का लड़खड़ाना ही प्रमुख है। राजतन्त्र के उत्थान- पतन पर भी उसी का प्रभाव पड़ता है। कोई समय था जब यथा राजा तथा प्रजा की उक्ति सही थी। अब जनतन्त्र का प्रचलन होने पर यथा प्रजा तथा राजा की नई स्थापना हुई है। अब वोटर ही शासन सत्ता किसे सौंपी जाय, इसका निर्णय करते हैं। ऐसी दशा में मतदाता का जागरूक, दूरदर्शी और आदर्शों के प्रति निष्ठावान होना आवश्यक है। यह कार्य विशुद्ध रूप से धर्मतन्त्र का है।
राजतन्त्र भौतिक क्षेत्र की व्यवस्थाएँ बना सकता है, पर उसकी प्रकृति कूटनीति प्रधान, दमन नियन्त्रण पर निर्भर होने के कारण आस्थाओं का निर्माण करने जैसी जटिल प्रक्रिया को सम्भाल सकने में समर्थ नहीं रहती है। शिक्षा एवं प्रचार जैसे कार्य तो सरकार या संपन्न लोगों द्वारा हो सकते हैं, पर अन्तःकरण की गहराई तक पहुँच कर व्यक्ति को उदात्त एवं उदार बना सकना उसके बस की बात नहीं है। आस्था क्षेत्र को प्रभावित कर सकना धर्मतन्त्र की ही परिधि में आता है। अस्तु उसे सर्वोपरि महत्व मिलने की बात हर दृष्टि से उचित एवं उपयुक्त है।

प्रस्तुत परिस्थिति को बदलने के लिए आवश्यक हो गया है कि नीतिमत्ता के प्रति निष्ठा उत्पन्न करने का काम नये सिरे से आरम्भ कया जाय। इसे धर्मतन्त्र का पुनर्जीवन, कायाकल्प या नव निर्धारण भी कह सकते हैं। पुरातन का जीर्णोद्धार तो होना ही चाहिए। समय की आवश्यकता को देखते हुए उसमें नये तत्वों का समावेश भी अनिवार्य हो गया है। वैज्ञानिक, बौद्धिक और आर्थिक प्रगति की इन शताब्दियों में प्रगति की दिशा धारा अत्यन्त तीव्र हुई है। उसने नई आवश्यकताएँ और समस्याएँ उत्पन्न की हैं। भौतिक क्षेत्र में ही नहीं आत्मिक क्षेत्र में भी। अब बिजली और द्रुतगामी वाहनों के बिना काम चल सकना कठिन है। दो शताब्दी पूर्व इनके बिना काम चल जाता था, पर अब तो ये अन्न- वस्त्र की तरह आवश्यक हो चले हैं। उसी प्रकार चिन्तन और व्यवहार में भी भारी उथल- पुथल हुई है और उनने व्यक्ति तथा समाज को आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित किया है। इन नई उपलब्धियों को धर्मतन्त्र में भी जगह मिलनी चाहिए। गोदान, तीर्थ स्थान, कथा प्रवचन एवं धर्मानुष्ठानों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उसमें पीड़ा और पतन का निवारण कर सकने वाले अनेक तथ्यों का समावेश करना होगा। कुरीतियों का उन्मूलन भी अब परमार्थ में ही माना जायेगा। शिक्षा प्रसार और वृक्षारोपण जैसे कार्य भी अब धर्म क्षेत्र का ही आश्रय पाना चाहेंगे। ज्ञान- यज्ञ की जो परिधि पुरातन काल में थी, अब उसका दायरा कहीं अधिक विस्तृत करने की आवश्यकता पड़ेगी। धर्म क्षेत्र न केवल परिशोधन चाहता है वरन् उसमें बहुत कुछ परिवर्तन भी चाहिए। समय की दौड़ कहाँ से कहाँ पहुँच गई। आस्थाओं को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया को भी समय को पहचानना और तदनुरूप तालमेल बिठाना पड़ेगा।

धर्मतन्त्र को जीवन्त एवं प्रखर बनाने वाले तीन आधार रहे हैं- (१) गतिविधियों का सूत्र संचालन करने के लिए भवन, देवालय (२) निर्धारित प्रयोजनों को व्यापक बनाने के लिए जन सहयोग, सन्त ब्राह्मण, वानप्रस्थ आदि लोकसेवियों का समुदाय (३) कार्यकर्ताओं के निर्वाह तथा क्रियाकलापों को अग्रगामी बनाने के लिए अर्थ साधन। इन्हीं तीन आधारों पर कोई समर्थ तन्त्र खड़ा रह सकता है। शासन को भी अपने अगणित उत्तरदायित्वों की पूर्ति का सूत्र संचालन इमारतों के आश्रय में ही करना पड़ता है। बड़े कारखाने अथवा छोटे निवास गृह सर्व प्रथम स्थान माँगते हैं। धर्म को यदि देवालयों की आवश्यकता पड़ती है, तो यह सर्वथा उचित ही है। जन- समुदाय के सहारे ही शासन व्यवस्था चलती है। कारखाने, छावनी, कला- कौशल, विद्यालय आदि में जनशक्ति का ही बोलबाला है। धर्म में यदि सन्त, ब्राह्मण, वानप्रस्थ जैसे पूरा समय देने वाले तथा धर्मप्रेमी भक्तजनों के रूप में छुटपुट श्रम साधना प्रस्तुत करते रहने वालों का एक बड़ा वर्ग कार्य संलग्न रहता है तो उसे कर्म कौशल ही कहा जायेगा। सरकार टैक्स लगाती है। कारखाने मुनाफे लेते हैं। संस्थाएँ शेयर बेचती या चन्दा वसूल करती हैं। धर्म ने दान दक्षिणा के माध्यम से श्रद्धाभक्ति, स्वेच्छा, सहयोग उपलब्ध करने का मार्ग निकाला है, तो उसे औचिन्य के अन्तर्गत ही लिया जायेगा। तन्त्र चाहे शासकीय हो, आर्थिक हो, बौद्धिक, कलापरायण या धर्म धारणा से सम्बन्धित हो, हर हालत में इन तीनों साधनों को जुटाने की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करनी ही पड़ेगी। इन दिनों धर्म को प्रगतिशील बनाने और नव सृजन में समुचित योगदान के लिए समर्थ बनाने में भी इन तीन साधनों का नये सिरे से सरंजाम जुटाना पड़ेगा।

अच्छा होता कि धर्म के सुविस्तृत ढाँचे को ही परिवर्तित कर दिया गया होता और उसके हाथ में जो प्रचुर साधन हैं उनका उपयोग सामयिक आवश्यकता की पूर्ति में सम्भव हो सका होता। पर यह कार्य वर्तमान परिस्थितियों में लगभग असम्भव जैसा है। निहित स्वार्थों का शिकंजा इतना कसा हुआ है कि इसमें से साधनों को छुटकारा दिला सकना कठिन हैं। इसमें धर्म व्यवसायियों की समर्थता नहीं, वरन् सम्बन्धित जन समुदाय की भावनात्मक दुर्बलता भी बहुत बड़ा निमित्त कारण है। जनतन्त्र की ढोलपोल में बड़े सुधारों के लिए कड़े कदम उठ सकने सम्भव नहीं। इसमें भौतिक अधिकारों की, जनमत की बात आगे आती है और कितनी ही कुरीतियों को भी सहन करना पड़ता है। वर्तमान धर्म विडम्बना का अभीष्ट परिवर्तन इन परिस्थितियों में उतना नहीं हो सकता जितना तत्काल आवश्यक है। सुधार क्रम मंथर गति से चलाया जाय तो इसमें सैकड़ो वर्षों का समय लगेगा। आर्य समाज जैसी सुधारक संस्थाएँ एक शताब्दी का लम्बा समय बीत जाने पर भी उतना कुछ कर नहीं सकी हैं जितनी कि अपेक्षा थी।

ऐसी दशा में एकमात्र उपाय यही रह जाता है कि युगधर्म का निर्वाह कर सकने के लिए उपयुक्त ढांचे का धर्मतन्त्र खड़ा किया जाय। प्राचीनकाल में भी समय- समय पर इसी प्रकार सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति की गई है। भगवान बुद्ध, समर्थ गुरु रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, सन्त कबीर, दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि के प्रयासों को इसी श्रेणी में गिना जा सकता है। उनने अपने- अपने ढंग से ऐसे तन्त्र खड़े किये थे जिनमें भवन, जनसहयोग एवं अर्थ साधनों की आवश्यकता जुटाई गई थी और भावनात्मक उत्कर्ष का कार्य आगे बढ़ाया गया था। पुरातन को सुधारने का लम्बा रास्ता उनमें से किसी को भी सफल होता नहीं दीखा। फलतः उनने अपने ढंग से अपना ढांचा खड़ा करके कार्य आरम्भ कर दिया। इन प्रयत्नों की शानदार परम्परा और सराहनीय सामयिक उपलब्धि रही है। यह बात दूसरी है कि पीछे उन प्रयासों में विकृतियाँ घुस पड़ी। यह भी नियति की वडम्बना है कि कालान्तर में हर वस्तु जराजीर्ण हो जाती है। उसकी प्रखरता घटती और कुरूपता बड़ती है। काया की भी ऐसी ही दुर्गति होती है। नव यौवन और जराजीर्ण कार्यों के बीच जमीन- आसमान जैसा अन्तर दीखता है और पतन पराभव पर निराशा होती है। इतने पर भी सृष्टा की यह व्यवस्था उत्साहवर्धक है कि अनुपयोगी होते ही दूसरी समर्थ शक्तियाँ उसे पदच्युत कराने में नहीं चूकती। जराजीर्ण काया को मौत आ दबोचती है और अनुपयुक्त संस्थानों की मरम्मत न बन पड़ने पर उसे तोड़कर नया ढांचा खड़ा करने के लिए जागरूकता सदा तत्पर रहती है।

समय की माँग है कि संव्याप्त विकृतियों से जूझने और उनके स्थान पर शालीनता की स्थापना का प्रबल प्रयत्न किया जाय। कहना न होगा कि इस आवश्यकता की पूर्ति चिन्तन और चरित्र को प्रभावित, परिष्कृत कर आवश्यकता की पूर्ति के लिए युगधर्म का वह ढांचा खड़ा करने की आवश्यकता है जो शाश्वत सिद्धांतों का परिपूर्ण पालन करते हुए विकृतियों से जूझने और सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु कटिबद्ध, समर्थ एवं सफल हो सके। समर्थ धर्मतन्त्र ही सशक्त और प्राणवान लोकमत का मूल आधार है। मानव में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण जैसी उपलब्धियाँ चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश किये बिना सम्भव नहीं। यह कार्य धर्मतन्त्र का तत्वदर्शन एवं प्रचलन प्रवाह ही सम्पन्न कर सकता है।

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