पृष्ट संख्या:

माता भगवती देवी शर्मा

    
स्नेह सलिला, परम वन्दनीया, शक्तिस्वरूपा, सजल श्रद्धा की प्रतिमूर्ति माता भगवती देवी शर्मा आश्विन कृष्ण चतुर्थी, संवत १९८२ को प्रातः आठ बजे आगरा नगर के श्री जशवंत राव जी के घर चौथी संतान के रूप में जन्मीं ।

ऐश्वर्य सम्पन्न घराने में पली-बढ़ी माताजी का विवाह आगरा से २५ किमी.दूर आँवलखेड़ा में एक जमींदार परिवार पं.रूपकिशोर के सुपुत्र गायत्री साधक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीराम मत्त (आज के युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचर्य) के साथ हुआ । सन् १९४३ में विवाह के बाद माता जी ससुराल पहुँची, जहाँ आचार्य जी ओढ़ी हुई गरीबी का जीवन जी रहे थे । जैसा पति का जीवन वैसा ही अपना जीवन, जहाँ उनका समर्पण उसी के प्रति अपना भी समर्पण, इसी संकल्प के साथ वे अपने धर्म निर्वाह में जुट गयीं ।

उन दिनों आचार्य जी के २४ महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चल रही थीं । वे जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह कर रहे थे । माता जी ने जौ की रोटी व छाछ तैयार करने से अपने पारिवारिक जीवन की शुरुआत की । कुछ ही वर्ष आँवलखेड़ा में बीते थे कि माताजी अपने जीवन सखा के साथ मथुरा आ गयीं । यहाँ पूज्य गुरुदेव अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका अखण्ड ज्योति का सम्पादन करते, पाठकों की वैचारिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक आदि समस्याओं का समाधान पत्र व्यवहार एवं पत्रिका के माध्यम से करते और माताजी आगन्तुकों का आतिथ्य कर घर में जो कुछ था, उसी से उनकी व्यवस्था जुटातीं ।

मात्र २०० रुपये की आय में दो बच्चे, एक माँ, स्वयं दोनों इस तरह कुल पाँच व्यक्तियों के साथ प्रत्येक माह अनेक आने-जाने वालों, अतिथियों का हँसी-खुशी से सेवा सत्कार करना, उनके सुख-दुःख को सुनना तथा सुघर गृहणी की भूमिका निभाना केवल माताजी केवश का था । जो भी आता उसे अपने घर जैसा लगता । आधी रात में दस्तक देने वाले को भी माताजी बिना भोजन किये सोने न देतीं । माताजी की संवेदना का एक स्पर्श पाकर व्यक्ति निहाल हो जाता ।

प्रारंभिक दिनों में अखण्ड ज्योति पत्रिका घर के बने कागज पर हैण्ड प्रेस से छपती थी । माताजी उसके लिए हाथ से कूटकर कागज तैयार करतीं उसे सुखातीं, फिर पैर से चलने वाली हैण्ड प्रेस द्वारा खुद पत्रिका छापतीं । उन पर पते लिखकर डिस्पैच करतीं । यह सभी कार्य माताजी की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया था । बच्चों की देखभाल, पढ़ाई-लिखाई आदि की जिम्मेदारी थी ही । इसी श्रमपूर्ण जीवन ने माताजी को आगे चलकर परम वन्दनीया माताजी के भावभरे वात्सल्यपूर्ण संबोधन से नवाजा और वे जगन्माता बन गयीं ।

माताजी कहती-'हमारा अपना कुछ नहीं, सब कुछ हमारे आराध्य का है, समाज राष्ट्र के लिए समपत है ।' अवसर आने पर वे इसे सत्य कर दिखाती थीं । उन दिनों आचार्य श्री के मस्तिष्क में गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना का तानाबाना चल रहा था, परन्तु पैसे का अभाव था । ऐसे समय में माताजी ने अपनी ओर से पहल करके अपने पिता द्वारा प्रदत्त सारे जेवर बचकर निर्माण कार्य में लगाने के लिए सौंप दिये । जो आज असंख्य अनुदानों-वरदानों एवं करोड़ों परिजनों के रूप में फल-फूल रहा है ।


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