हमारा युग निर्माण सत्संकल्प

  
इस सृष्टि का निर्माण, विकास और विलय परमात्मा के संकल्प से ही होता रहा है ।। परमात्मा के संकल्प से होता रहा है ।। परमात्मा की श्रेष्ठ कृति मनुष्य भी अपने समाज एवं संसार को संकल्पों के आधार पर ही बनाता- बदलता रहता है ।।

श्रीराम शर्मा ने इस महत्त्वपूर्ण समय में जन- जन को ईश्वर के साथ भागीदारी के लिये आमंत्रित एवं प्रेरित किया है ।। नव सृजन की ईश्वरीय योजना का उन्होंने युग निर्माण योजना कहा है ।।

युग निर्माण के ईश्वरीय संकल्प में हर नैष्ठिक की भागीदारी के लिये उन्होंने इस सत्संकल्प की रचना की है ।। इसके १८ सूत्र गीता के १८ अध्यायों की तरह सारगर्भित हैं ।। सूत्रों का गठन इस कुशलता से किया है कि यह क्षेत्र, भौगोलिक भेद और मानवीय वर्ग भेद से परे सभी साधक ईश्वरीय भागीदारी निभाते हुए अनुपम एवं अलौकिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।।

व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर नियम से धीरे- धीरे, समझकर एवं श्रद्घापूर्वक पढ़ें ।।

1. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे ।।

2. शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्म- संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे ।।

3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे ।।

4. इंद्रिय- संयम, अर्थ- संयम, समय- संयम और विचार- संयम का सतत् अभ्यास करेंगे ।।

5. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे ।।

6. मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

7. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे ।।

8. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे ।।

9. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

10. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे ।।

11. दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं ।।

12. नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे ।।

13. संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे ।।

14. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे ।।

15. सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे ।।

16. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान रहेंगे ।। जाति, लिंग, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे ।।

17. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा ।।

18. हम बदलेंगे- युग बदलेगा, हम सुधरेंगे- युग सुधरेगा इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है ।।

समग्र साहित्य


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