जीवेम शरदः शतम्

    
स्वस्थ रहना मनुष्य का अधिकार है, एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । इसी आधार पर हमारे ऋषिगणों ने मनुष्य के लिए जीवेम शरदः शतम् व्यक्ति सौ वर्ष तक जिए, निरोग जीवन जीकर सौ वर्षों की आयुष्य का आनन्द ले, सूत्र दिया था । सौ वर्ष से भी अधिक जीने वाले, स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धान्तों को जीवन में उतारने वाले अनेकानेक व्यक्ति कभी वसुधा पर थे एवं इसे एक सामान्य सी बात माना जाता था । स्वस्थ वृत्त को जीवन में उतारने वाला सौ वर्ष तक जीकर ही-अपना सारा जीवन व्यापार पूरा कर ही मोक्ष को प्राप्त होगा, यह हमारी संस्कृति का कभी जीवन दर्शन था । किन्तु आज यह सब एक विलक्षणता मानी जाती है जब सुनने में आता है कि किसी ने सौ वर्ष पार कर लिए व अभी भी नीरोग है । परमपूज्य गुरुदेव ने वाङ्मय के इस खण्ड में जहाँ बिना ओषधि के कायाकल्प की बात कही है, वहीं जड़ी-बूटियों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण, कल्प के विभन्न शरीर परक बार्धक्य कभी न लाने वाली सुगम प्रयोग भी दिए हैं जो आज भी परीक्षित करने पर कसौटी पर खरे सिद्ध हो सकते हैं ।

रोग क्यों होते हैं, उनका कारण क्या है व कौन-कौन से घटक इसके लिए जिम्मेदार होते हैं, यहाँ से यह खण्ड आरंभ होता है । रोगों की उत्पत्ति की जड़ हमारी जीवन शैली का त्रुटिपूर्ण होना है तथा कब्ज से लेकर आहार के असंयम रहन-सहन से लेकर मानसिक तनाव तथा दैवी प्रतिकूलताओं से लेकर बैक्टीरिया-वायरस के कारण होने की व्याख्या के पीछे पूज्यवर का मंतव्य एक ही है कि हमारी जीवनी शक्ति-प्राणशक्ति यदि अक्षुण्ण रहे व जीवन शैली सही रहे तो हमें कभी रोग-शोक सता नहीं सकते । पंचभूतों से बनी इस काया को जिसे अंत में मिट्टी में ही मिल जाना है क्या हम पंचतत्त्वों आकाश, वायु, जल, मिट्टी, अग्नि के माध्यम से स्वस्थ बना सकते हैं, इसका समग्र विवेचन इस खण्ड में विस्तार से हुआ हैं प्राकातिक चिकित्सा का यही सिद्धान्त है कि पंचतत्त्वों से ही रोगों को दूरकर अक्षुण स्वास्थ्य प्रदान किया जाय । पंचमहाभूतों को आकाश को ध्वनि से, वायु को स्पर्श से, अग्नि को रंग-रूप-ऊर्जा से, जल को रस-स्वाद से तथा पृथ्वी को गंध से जाना जाता है । यही गुण स्वास्थ्य संवर्धन में भी काम आते हैं ।

क्या कायाकल्प बिना किसी ओषधि के भी हो सकता है ? पूज्यवर कहते हैं, हाँ ! इस विषय पर उनने सुप्रसिद्ध छह आना सीरिज में आज से प्रायः चालीस वर्ष पूर्व एक पुस्तक लिख दी थी एवं इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए । इसमें उनने लिखा है कि प्रगतिशील सभ्यता की दौड़ में अग्रणी मानव को पीछे की ओर लौटना होगा-प्रकृति के नियमों का पालन करना सीखना होगा । उत्तम स्वास्थ्य बिना ओषधि के बनाए रखने के लिए उनने चारसूत्र दिए हैं-खाद्य पदार्थों का सही चुनाव, सही खाने का तरीका, समुचित परिश्रम, अव्यवस्था से बचकर व्यवस्थित जीवनचर्या । उपवास, शरीर शुद्धि व कायाकल्प के सिद्धान्त को पूज्यवर ने यहाँ विस्तार से समझाया हैं । कब्ज मिटाकर कैसे मनुष्य स्वस्थ बना रह सकता है व स्फूर्ति से भरी दिनचर्या कैसे स्वयं बनायी जाती है, यह सारा विवेचन उसमें है । प्राकातिक चिकित्सा की सारी धुरी उसी पर केन्द्रित है । इस पर पूज्यवर ने कई प्रयोग स्वयं पर करके उसके निष्कर्ष दिए हैं एवं वस्तुतः व्यक्ति यदि इन सभी बातों का ध्यान रखकर नैसर्गिक जीवनचर्या को अंगीकार कर ले, वैसा ही आहार ले व चिंतन स्वस्थ, मन प्रफुल्लित रखे तो किसी तरह की कोई व्याधि होने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता ।

चूंकि आज का मनुष्य निर्भर तो कात्रिम साधनों पर ही है । हवा, पानी भी विषाक्त हो चुके हैं । ऐसे में यदि ओषधियों की आवश्यकता भी पड़े तो इसके लिए कौन सी ली जायँ । पूज्यवर कहते हैं कि जड़ी-बूटी स्वस्थ नीरोग जीवन प्रदान करती हैं । उनके कोई दुष्परिणाम नहीं होते व सही अनुपान के साथ सही वीर्य कालावधि में पकी ओषधि लेने पर लाभ ही लाभ पहुँचाती है । काष्ठ-ओषधि विज्ञान-वनौषधि विज्ञान का पूज्यवर ने वस्तुतः पुनर्जीवन किया व लुप्त हो रही वनौषधियों की गरिमा को पुनः स्थापित कर उनको स्थान-स्थान पर आरोपित कर वनौषधि उपवन लगाने की महत्ता पर बहुत जोर दिया । ब्रह्मवर्चस् शोध-संस्थान के वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर प्रायः 50 से अधिक वनौषधियाँ पर शोधस्तर का एक ग्रन्थ भी प्रकाशित किया गया है व इनके व्यापक अनुसंधान वहाँ संपन्न हुए हैं । एकोषघि प्रयोग के रूप में लिए जाने पर व एक जैसे गुणों वाली ओषधियों के सम्मिलित प्रयोग से क्या लाभ कैसे होता है, इसका पूरा वैज्ञानिक आधार पूज्यवर ने समझाया है । अब ढाई सौ से अधिक ओषधियाँ तैयार चूर्ण के रूप में, ताजी औषधियों के रूप में सदा गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में उपलब्ध रहती हैं । इन सबका वैज्ञानिक विश्लेषण, विवेचन, शरीर-मन आदि पर प्रभाव का पूरा विवरण इस वाङ्मय में परिजन पढ़ेंगे ।

आर्युवेद का गौरव है वनौषधियाँ जिनमें समग्रता होती है । यदि यह विज्ञान घर-घर फैल सके तो हमारी ऐलोपैथी पर-तेज असर कारक औषधियों पर निर्भरता समाप्त हो जायगी । यही पूज्यवर की सोच थी व इसी आधार पर केंद्र में भी व स्थान-स्थान पर हर्बल गार्डन बनते चले गए । पूज्यवर ने मसाला वाटिका से घरेलू उपचार पर भी जोर दिया । घर में ही पायी जाने वाली, आँगन में उगायी जा सकने वाली औषधियों से जिन्हें हम मसालों में प्रयोग करते हैं अनेकानेक रोगों का उपचार किया जा सकता है । राई, हल्दी, अदरक, सौंफ, मेथी, जीरा, मिर्च, पुदीना, गिलोय, तुलसी, अजवाइन, धनिया, टमाटर, लहसुन, ग्वारपाठा, प्याज, आँवला ऐसी औषधियाँ हैं जो घर-घर हो सकती हैं, सूखी स्थिति में कुछ रखी भी जा सकती हैं । सुहागा, हींग, काला नमक, लौंग, तेज पत्रक, दालचीनी, ऐसे हैं जिन्हें सुरक्षित अपने पास रखकर विभन्न रोगों में प्रयोग किया जा सकता है । अंत में कल्पचिकित्सा के विभन्न पक्षों पर पूज्यवर ने कलम-चलाई है । आर्युवेदोक्त पंचकर्म से लेकर कुटी प्रवेश तथा विभन्न कल्प प्रयोगों को पढ़कर हर किसी को लगेगा कि आज के युग में भी सौ वर्ष जीवित रहना कोई असंभव कार्य नहीं है॥

समग्र साहित्य


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