व्यक्ति निर्माण

पिछले दिनों भौतिक विज्ञान व बुद्धिवाद का जो विकास हुआ है। उसने मानव जाति के हर पहलू को भले या बुरे रूप में प्रभावित किया है ।। लाभ यह हुआ कि वैज्ञानिक आविष्कारों से हमें बहुत सुविधा- साधन मिले और हानि यह हुई कि विज्ञान के प्रत्यक्षवादी दर्शन से प्रभावित बुद्धि ने आत्मा, परमात्मा, कर्मफल एवं परमार्थ के उन आधारों को डगमगा दिया जिन पर नैतिकता, सदाचरण एवं उदारता अवलम्बित थी। धर्म और अध्यात्म की अप्रामाणिकता एवं अनुप योग िता विज्ञान ने प्रतिपादित की ।। इससे प्रभावित प्रबुद्ध वर्ग ओछी स्वार्थपरता पर उतर आया ।। आज संसार का धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक नेतृत्व जिनके हाथ में है उन अधिकांश वक्तियोंआदर्श संकीर्ण स्वार्थों तक सीमित हैं ।। विश्व कल्याण को दृष्टि में रखकर उदार व्यवहार करने का साहस उनमें रहा नहीं, भले ही वे बढ़- चढ़कर बात उस तरह की करें ।। ऊँचे और उदार व्यक्तित्व यदि प्रबुद्ध वर्ग में से नहीं निकलते और उस क्षेत्र में संकीर्ण स्वार्थपरता व्याप्त हो जाती है, तो उससे नीचे वर्ग, कम पढ़े और पिछड़े लोग अनायास ही प्रभावित होते हैं ।। संसार में कथन की नहीं, क्रिया की प्रामाणिकता है ।। बड़े कहे जाने वाले जो करते हैं, जो सोचते हैं, वह विचारणा एवं कार्य पद्धति छोटे लोगों के विचारों में, व्यवहार में आती है ।।

(१) प्रात: उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्वास, नित्य, कर्म, अन्यान्य काम -- काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिए। इससे कम में पुण्य- परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सु संस्कार ित स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।


(२) आजीविका बढा़नी हो तो अधिक योग ्यता बढायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनो योग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरतापूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता गले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाठ- बाट, प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।


(३) अहिर्निश पशु- प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते हैं। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी, मित्र, परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कु संस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिए। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबलपुरूषार्थ करना चाहिए। कुविचारों को परास्त कराने का एक ही उपाय है- प्रज्ञासाहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिए।


(४) प्रतिदिन प्रज्ञा योग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध- सोते समय तत्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उप योग ।। यही है -- त्रिविध सोपानों वाला प्रज्ञा योग ।। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त -व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र

बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिये योग भ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिये सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योग भ्यास ‘प्रज्ञा योग ’ की साधना है। उसे भावना पूर्वक अपनाया और निष्ठापूर्वक निभया जाय ।।

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेआत्मक बनाया जाय। अभवों की सूची फाड़ फेकनी चाहिये और तो उपलब्धियाँ हस्तगत हैं, उन्हें असय प्राणियों कह अपेक्षा उच्चतरीये मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट खिन्न,उव्दिग्र रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है जिसके कारण समाधन और उत्थान के सारे द्वार बन्द हो जाते है।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें ।। असीम महत्वकाक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये पराक्रम सेही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें ।। कुरूपता नहीं, सौंन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराशा न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नही दानी बनें। आत्मावल बनसी। अंहकार तो हटायें पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपने समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करें पर बदलें की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोडें और उसके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्त्वकांक्षा सँजोयें। स्मरण ,, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है। 



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