प्रशिक्षण शिविर

  समग्र शिक्षा वह है, जिसमें न केवल भौतिक जगत् के विभिन्न विषयों की जानकारियाँ मिलें, वरन् व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास में काम आने वाला मार्गदर्शन भी सम्मिलित हो, जीवन के साथ जुड़े हुए प्रश्नों का समाधान और प्रगति पथ पर निरन्तर अग्रगमन के लिए प्रेरणाप्रद प्रकाश भी उपलब्ध होता हो ।। विद्या को इसी दृष्टि से अमृत कहा है कि यदि वह सही और सार्थक हो तो उसके सहारे कल्पवृक्ष की तरह अभीष्ट प्रकार के अवलम्बन हस्तगत होते रह सकते हैं ।।

प्राचीन काल में गुरुकुलों, आरण्यकों एवं तीर्थ क्षेत्रों में बने ऋषि आश्रमों में ऐसी व्यवस्था रहती थी ।। उनमें हर आयु के भावनाशील शिक्षार्थी पहुँचते थे और मनुष्य शरीर में देवत्व का बढ़ा- चढ़ा अनुपात लेकर वापस लौटते थे ।। ऐसी शिक्षण संस्थाओं को 'नर रत्नों की खदान' कहकर गौरवान्वित किया जाता था ।। नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय इसी स्तर के थे ।। बौद्ध विहारों और संघारामों में भी ऐसी ही व्यवस्था थी ।। इसी प्रभाव से धरती पर स्वर्ग का अवतरण होना और मनुष्य में देवत्व की झलक मिलना सर्वत्र संभव बना रहा ।। उस ऋषि वर्चस्व प्रधान समय को सतयुग कहा जाता रहा ।।

इसी प्राचीन शिक्षा प्रक्रिया के सारे तत्त्व लेकर अपने स्वल्प साधनों के अनुरूप, शान्तिकुञ्ज को एक सामयिक शिक्षण एवं साधना केन्द्र के रूप में विनिर्मित किया गया है ।। इस व्यवस्था के लिए केवल पाठ्यक्रम ही पर्याप्त नहीं होता, साथ में तदनुरूप वातावरण भी विनिर्मित करना पड़ता है ।। स्वास्थ्य संवर्धन केन्द्र (सेनीटोरियम) बनाने के लिए उपयुक्त जलवायु वाले स्थानों का चयन किया जाता है ।। फलतः वहाँ चिकित्सा कराने पर सभी लोग, साधारण स्थानों की अपेक्षा अत्यन्त तेजी से स्वास्थ्य सुधारने में सफल होते हैं ।। उच्चस्तरीय शिक्षा के सम्बन्ध में भी ठीक यही सिद्धांत लागू होता है ।।
इस दृष्टि से शान्तिकुञ्ज अपने स्तर का अनुपम स्थान है ।। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्तऋषियों की तपोभूमि आदि, प्राचीन काल से संचित अनेकानेक आध्यात्मिक संस्कारों के अतिरिक्त अखण्ड अग्नि में नित्य यज्ञ, शान्तिकुञ्ज की स्थापना से अभी तक विविध साधना सत्रों के माध्यम से लाखों साधकों द्वारा की गई साधना की ऊर्जा, १९२६ से प्रज्वलित अखण्ड दीपक जिसके सामने प.पू. गुरुदेव ने २४- २४ लक्ष के २४ महापुरश्चरण सम्पन्न किए, अखण्ड गायत्री जप, हिमालय की ऋषिसत्ता का दिव्य संरक्षण तथा परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी द्वारा की गई कठोर तपश्चर्या से यह स्थान अनुप्राणित है ।। इस प्रकार की विशेषताओं के कारण यह स्थान ऐसा है जहाँ सामान्य लोगों द्वारा सामान्य ढंग से की गई साधनायें भी विशिष्ट फलप्रदान करती हैं ।।

शान्तिकुञ्ज में अनेकानेक भौतिक विषयों को पढ़ाने की व्यवस्था तो नहीं की गई है, क्योंकि उनके लिए सरकारी, गैर सरकारी स्तर पर सभी जगह व्यवस्थाएँ हैं ।। संजीवनी विद्या जीवन जीने की कला का हर पक्ष जिसमें सम्मिलित रहे, ऐसे प्रशिक्षण की व्यवस्था यहाँ पर बनायी गयी है ।।
प्रस्तुत योजना के अनुसार मुख्य रूप से दो प्रकार के सत्र चलते हैं ।।
(१) साधना प्रधान
(२) प्रशिक्षण प्रधान

साधना प्रधान सत्रों के अन्तर्गत इन दिनों दो प्रकार के सत्र चल रहे हैं ।।
नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्र
अन्तः ऊर्जा जागरण साधना सत्र

प्रशिक्षण सत्रों के अन्तर्गत इन दिनों तीन प्रकार के सत्र चल रहे हैं ।।
युग शिल्पी सत्र
परिव्राजक सत्र
रचनात्मक सत्र

शान्तिकुञ्ज एवं पापुलेशन फाउण्डेशन ऑफ इण्डिया नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में प्रत्येक माह ६ दिवसीय स्वस्थ प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य (आर.सी.एच.) के सत्र भी २३ से २८ की तिथियों में नियमित रूप से चलते हैं ।।

अन्य सत्र

समय- समय पर सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं (कार्पोरेशन सेक्टर) के अधिकारियों, प्रबंधकों व कर्मचारियों के नैतिक प्रशिक्षण सत्र तथा अन्यान्य विशेष सत्रों का भी आयोजन होता रहता है ।।
शिविरार्थियों के लिए आवास, भोजन एवं प्रशिक्षण आदि की निःशुल्क व्यवस्था है ।। यह क्रम इसलिए रखा गया है कि गरीब- अमीर सभी इस प्रक्रिया से लाभान्वित हो सकें ।। किसी को आर्थिक कठिनाई के कारण इस सुयोग से वंचित न रहना पड़े ।। जिनकी सार्मथ्य है और वे श्रद्धानुसार- उदारतापूर्वक, सहयोग स्वरूप कुछ देना चाहते हैं तो उसे सहर्ष सम्मान के साथ स्वीकार कर लिया जाता है ।। भावनाशीलों की इस उदारता से ही आश्रम की व्यवस्था चलती है ।।

महिलाएँ अकेली न आयें ।। छोटे बच्चों को साथ न लायें, उनके कारण ध्यान बँटता है और प्रशिक्षण पूरा करने में अड़चन आती है ।। वृद्ध जिनका शरीर श्रम साध्य दिनचर्या का निर्वाह नहीं कर सकता, उन्हें भी नहीं आना चाहिए ।। बच्चे, बूढ़े, बीमार, नशा करने वाले, आलसी- प्रमादी व्यक्तियों को सत्र में बिल्कुल नहीं आना चाहिए ।। किसी भी जाति के व्यक्ति, शिक्षित नर- नारी समान रूप से सम्मिलित हो सकते हैं ।। जेवर पहन कर अथवा कीमती वस्तुएँ साथ लेकर किसी को भी नहीं आना चाहिए, ताकि चोर उचक्कों को घात लगाने का अवसर न मिले ।।

हरिद्वार में अधिक सर्दी होने जैसा भय किसी को नहीं करना चाहिए ।। उत्तर भारत में साधारण स्थानों पर- दिल्ली, हरियाणा क्षेत्र जैसी ठण्ड यहाँ भी पड़ती है ।। इतना अवश्य है कि गर्म कपड़ों की आवश्यकता- सितम्बर के मध्य से मार्च तक पड़ती है, जिन्हें गर्म पानी से नहाने का अभ्यास है, उनके लिए उसका प्रबन्ध भी हो जाता है ।। रजाई गद्दे भी किराये पर उपलब्ध हो जाते हैं ।।

जहाँ भी प्रज्ञा मण्डल, महिला मण्डल स्थापित हुए हैं, उनके सभी सदस्यों को छोटा बड़ा एक सत्र अवश्य कर लेना चाहिए इससे उनकी श्रद्धा और प्रतिभा में वृद्धि होगी तथा वे नये उत्तरदायित्वों का निर्वाह अधिक अच्छी तरह कर सकेंगे ।।

विशेष ज्ञातव्य

(१) किसी भी सत्र में आने से पूर्व सत्र की अनुमति लेना अनिवार्य है ।। आने वाले परिजनों की केवल संख्या लिख देने भर से स्वीकृति भेजना संभव नहीं है ।। आवेदन पत्र स्पष्ट अक्षरों में भरकर भेजें ।।
(२) पत्र भेजने वाले परिजनों को स्वीकृति न मिलने पर काफी निराशा होती है ।। स्वीकृति पत्र प्राप्त न होने के कई कारण हैं, जैसे- पत्र का विलम्ब से मिलना, स्थान का भर जाना, पत्र में पता का न लिखना, अधूरा लिखना या खराब लिखावट के कारण पत्र का न पढ़ा जाना ।। अतः अपना पता स्पष्ट अक्षरों में और पूरा लिखें ।। कभी- कभी डाक विभाग की गड़बड़ी से भी पत्र प्राप्त नहीं होते ।।
(३) जो परिजन तीर्थ सेवन या विभिन्न प्रकार के संस्कार पुंसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ एवं दीक्षा कराने के उद्देश्य से दो- तीन दिनों के लिये आना चाहते हैं, वे कभी भी आ सकते हैं ।। सम्भव हो तो पूर्व सूचना भेज दें ।।
(४) कमरे की बुकिंग पहले से नहीं होती है ।। आगन्तुकों की संख्या के आधार पर ठहरने की व्यवस्था अलग से या सामूहिक रूप से होती है ।। गर्मी के महीने में संख्या अधिक होने के कारण आवास या अन्य असुविधाएँ हो सकती हैं ।। अतः जो लोग अन्य महीनों में सत्र कर सकते हैं वे मई से जुलाई तक के सत्रों के लिए आवेदन न करें ।।
(५) सत्र की तिथि से दो -- ढाई महीने पूर्व ही आवेदन करें, ताकि समय से स्वीकृति दी जा सके ।।

समग्र साहित्य


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