युग परिवर्तन कब और कैसे

   सभी एक स्वर से यह कह रहे हैं कि प्रस्तुत वेला युग परिवर्तन की हैं इन दिनों जो अनीति व अराजकता का साम्राज्य दिखाई पड़ रहा है, इन्हीं का व्यापक बोल बाला दिखाई दे रहा है, उसके अनुसार परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी है ऐसे ही समय में भगवान "यदा- यदा हि धर्मस्य" की प्रतिज्ञा के अनुसार असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए कटिबद्ध हो ''संभवामि युगे युगे'' की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए आते रहे हैं।।


ज्योतिर्विज्ञान प्रस्तुत समय को जो 1850 ईस्वी सदी से आरम्भ होकर 2005 ईस्वी सदी में समाप्त होगा- संधि काल, परिवर्तन काल, कलियुग के अंत तथा सतयुग के आरम्भ का काल मानता चला आया है ।। इसीलिए इस समय को युगसंधि की वेला कहा गया है ।। कुछ रूढ़िवादी पण्डितों के अनुसार नया युग आने में अभी 3 लाख 24 हजार वर्ष की देरी है, किन्तु यह प्रतिपादन भ्रामक है, यह वास्तविक काल गणना करने पर पता चलता है ।। हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व से लेकर श्रीमद्भागवत गीता का उल्लेख कर परम पूज्य गुरुदेव ने इसमें यह प्रमाणित किया है कि वास्तविक काल गणना के अनुसार सतयुग का समय आ पहुँचा ।। हजार महायुगों का समय जहाँ ब्रह्मदेव के एक दिवस के बराबर हो व ऐसे ही हजार युगों के बराबर रात्रि हो, वहाँ समझा जा सकता है कि काल की गणना को समझने में विद्वज्जनों द्वारा कितनी त्रुटि की गयी है।।


परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि 1980 से 2000 व बाद का कुछ समय अनिष्ट को निरस्त करने और सृजन को समुन्नत बनाने वाली, देव शक्तियों के प्रबल पुरुषार्थ के प्रकटीकरण का समय है ।। जब भी ऐसा होता है, तब दैवी प्रकोप, विभीषिकाएँ, विनाशकारी घटनाक्रम, मनुष्य जाति पर संकटों के बादल के रूप में गहराने लगते हैं ।। मानवी बुद्धि को सुमति में, सदबुध्दि में बलात् बदलने हेतु किया गया अदृश्य स्तर का उसे एक उपक्रम भी समझा जा सकता है ।। ऐसे समय में मानसिक उन्माद, आत्म हत्यायें, युद्धोन्माद, स्थान- स्थान पर उभरते देखे जाते हैं, ऐसी व्याधियाँ फैलती दिखाई देती हैं जो कभी न देखी, सुनी गयीं किन्तु समय रहते ही यह सब ठीक होता चला जाता है ।।
    



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