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धातु समवृद्धि के लक्षण

१. क्षीण रस के लक्षण

शब्द का सहन न होना, हृदय कम्पन, शरीर का कांपना, शोष, शूल, अंग शून्यता (प्रसुप्ति ), अंगों का फड़कना, अल्प चेष्टा के करने पर भी थकावट और प्यास का अनुभव होना- ये सब मनुष्य शरीर में क्षीण रस के लक्षण हैं ।।

बढ़े हुए रस के कार्य

मुख से लार टपकना, अरुचि मुख की नीरसता, लार सहित उबकाई, जी मचलाना, स्रोतों का अवरोध, मधुर रस से द्वेष, अंग- अंग का टूटना तथा कफ़ के विकारों को करके पीड़ा देता है ।।


२. क्षीण रक्त के लक्षण

शरीर में रक्त के क्षीण होने से चमड़ी पर रूखापन खटाई और ठण्डे पदार्थों की इच्छा-सिरा का ढीला पड़ना, ये लक्षण होते हैं ।।

बढ़े हुए रक्त के कार्य

कोढ, विसर्पी, फोड़े- फुन्सी, रक्त प्रदर, नेत्र, मुख, लिङ्गं और गुदा का पकना, तिल्ली, बायगोला, बिदकती, मुख तरङ्ग अर्थात् मुख पर काली झाँई पड़ना, कामला, अग्निमान्ध, आँखों के सामने अंधियारी आना, शरीर और नेत्रों में ललाई, वातरोग आदि प्रायः पित्त के विकारों को करके शरीर में पीड़ा बढ़ाता है ।।


३. मांस क्षीण के लक्षण

शरीर में मांस के क्षीण होने से स्फिक्र (गण्ड स्थल के पास का भाग) और गण्ड स्थल (पौंर्दा) आदि में शुष्कता (सूख जाना ), शरीर में टोचने की सी पीड़ा अंश ग्लानि अर्थात् इन्द्रियों का अपने काम करने में असामर्थ्य, सन्धि के स्थान में पीड़ा और धमनियों में शिथिलता ये ही इसके लक्षण हैं ।।

होता है ।।
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