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मल, स्वेद, मूत्र एवं पुरीष

दोष और धातुओं के समान मलों की उपयोगिता भी मानव शरीर के लिए महत्त्वपूर्ण है ।।

आयुर्वेद के अनुसार जो शरीर के धातुओं एंवम् उपधातुओं को मलिन करते हैं वे मल कहलाते हैं ।।
'मलिनीकरणान्मलाः'

स्वेद, मूत्र और पुरीष को मल की संज्ञा दी गई है ।।

सुश्रुत के अनुसार- दोष धातुमल मूलं हि शरीरम् ।।

मानव शरीर दोष धातु और मल के बिना स्थिर नहीं रह सकता है, इससे मल की उपयोगिता स्वयं ही स्पष्ट हो जाती है ।। ये तीनों मल जब शरीर को धारण करते हैं तब स्वास्थावस्था होती है और विषम होने पर शरीर में विकृति पैदा होती है ।।

शरीर में मल की एक निश्चित मात्रा का होना अनिवार्य है जो शरीर को धारण करती है ।। शरीर में मल का क्षय होने पर शरीर निर्बल हो जाता है- जिसके लिए अष्टांग हृदय में मल शरीर के लिए उपयोगी होते हैं, उनका क्षय उनकी वृद्धि की अपेक्षा अधिक कष्टकारक होता है ।।

मलोचितत्वात् देहस्थ क्षयो वृद्धेस्तु पीडनः (अ.छ. २१)
इसके अतिरिक्त धातुओं के क्षय से पीड़ित यक्ष्मा रोगी केवल पुरीष के द्वारा ही बल प्राप्त करता है ।। यथा-
तस्मात् पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद राजयक्षिणः ।।
सर्वधातुक्षयार्त्तश्य बलं तस्य हि विड्बलम् ॥ (च.चि.अ. ८)

इसी प्रकार स्वेद और मूत्र का भी एक निश्चित परिमाण शरीर की स्थिरता के लिए आवश्यक है ।।



१. स्वेद- स्वेद शरीर का वह जलीय अंश है जो त्वचा के सूक्ष्म छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकलता है ।। स्वेद की प्रवृत्ति सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु में होती है- वातावरण की उष्णता, परिश्रम की अधिकता स्वेद प्रवृत्ति में मुख्य कारण है ।। कभी- कभी अधिक घबराने तथा भय के कारण भी स्वेद की प्रवृत्ति होती है ।। अन्य मलों के उत्सर्ग की भाँति स्वेद का उत्सर्जन भी एक नैसर्गिक स्थिति है, क्योंकि स्वेद के माध्यम से शरीर में स्थित विषैले एवं दूषित तत्त्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं ।।

इस प्रकार स्वेद प्रवृत्ति मानव शरीर के लिए शुद्धिकरण क्रिया है ।। स्वस्थ मनुष्य के शरीर में उचित समय में उचित परिमाण में पसीना निकलना अत्यन्त आवश्यक है ।।

स्वेद मेदोधातु का मल है- स्वेद वह स्रोतों का मूल अर्थात् उत्पत्ति स्थान मेद है ।। इसका दूसरा छोर रोमकूप में है ।।

मलः स्वेदस्तु मेदसः स्वेद वहानां स्रोतसां मेदो मूलं लोमक्पाश्च(च.वि. ५/८)

स्वेद का वहन करने वाले स्रोत असंख्य हैं ।। अन्त:स्त्वक में स्वेद का निर्माण करने वाली स्वेद ग्रन्थियाँ होती हैं ।। इनके चारों ओर कोशिकाओं का घना जाल होता है ।। स्वेद ग्रन्थियाँ कोशिकाओं के रक्त से जल तथा कुछ घनीभूत द्रव्यों का सर्वदा निर्हरण किया करती है ।। यही जल तथा उसमें विलीन द्रव्य स्वेद कहलाते हैं ।।

स्वेद की यथोचित प्रवृत्ति न होने पर मल स्थानों के दूषित होने से त्वचा सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ।।
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