पृष्ट संख्या:

सप्तधातु

१. रस धातु

सातों ही धातुओं में रस की गणना सबसे पहले की गई है, इस दृष्टि से यह सभी धातुओं में महत्त्वपूर्ण व अग्रणी माना जाता है ।। इसका एक कारण है कि रस के द्वारा ही समस्त धातुओं का पोषण होता है ।।
रस समस्त धातुओं के पोषण का माध्यम है ।। इसके अतिरिक्त शरीर को धारण करना तथा जीवन पर्यन्त शरीर का यापन करना ये दो इसके मुख्य कार्य हैं ।। इसके अतिरिक्त रस के माध्यम से ही सम्पूर्ण शरीर में रक्त का परिभ्रमण होता है ।।

-- ''तत्र रस गतौ धातुः अहरहगछतीति रसः ।''
अर्थात् रस गत्यर्थक धातु में प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है, जिसके अनुसार जो प्रतिक्षण अहः चलता रहता है, उसे रस कहते हैं
।।
अर्थात् पंचभौतिक, चतुर्विध, षडरसयुक्त दो प्रकार के अथवा आठ प्रकार के वीर्य वाले, अनेक गुण युक्त भलीभाँति परिणाम को प्राप्त हुए आहार का जो तेजोभूत सार भाग अत्यन्त सूक्ष्म होता है- वह रस कहलाता है ।।

विण्मूत्र आहारमले सारः प्रागीरितो रसः ।।
सः तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातूना प्रतपर्येत् ॥
अर्थात् पुरीष और मूत्र ये दोनों आहार के मल हैं और आहार का सार भाग रस कहलाता है । वह व्यान वायु के द्वारा सम्पूर्ण शरीर में भ्रमित होता है और सर्व शरीर में भ्रमण करता हुआ वह सभी धातुओं का तर्पण करता है ।।

शरीर में रस का परिमाण-

प्रत्येक मनुष्य का शरीर भिन्न- भिन्न आकार- प्रकार और भिन्न- भिन्न परिमाण वाला होता है ।। प्रत्येक मनुष्य की जठराग्नि और जरण शक्ति में भी भिन्नता पाई जाती है, अतः निश्चित रूप से कह सकना असम्भव है कि प्रत्येक शरीर में रस धातु का कितना प्रमाण है ।। रस धातु का निर्माण मुख्य रूप से उस आहार रस के द्वारा होता है, जो जठाराग्नि के द्वारा परिपक्व हुए आहार का परिणाम होता है ।।
परन्तु आयुर्वेदीय आचार्यों के द्वारा निरूपित मतानुसार रस का परिमाण प्रत्येक मनुष्य की अपनी अंजलि में नौ अंजलि होता है ।।

रस का मुख्य कर्म धारण करने के अलावा अवयवों को पोषण तत्त्व प्रदान करना है ।। मूल धातु होने के कारण शरीर के लिए आधारभूत है ।।

२. रक्त धातु

जिस प्रकार शरीर में समस्त धातुओं का मूल- रस धातु है, उसी प्रकार शरीर का मूल रक्त धातु है ।। आयुर्वेद के अनुसार रस का परिणाम ही रक्त है ।। रस धातु के सूक्ष्म भाग पर रक्त धात्वाग्नि की क्रिया के परिणाम स्वरूप ही रक्त का निर्माण होता है ।।

-रक्त धातु उष्ण और पित्त गुण प्रधान होता है ।। रक्त धातु का मल पित्त होता है ।।

देहस्थ रुधिर मूलं रुधिरेणेव धार्यते,
तस्माद्यप्नेन रक्तं जीव इति स्थिति ।( सुश्रुत)

अर्थात्- रक्त ही शरीर का मूल है और रक्त के द्वारा ही शरीर का धारण किया जाता है, इसलिए इस रक्त की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि रक्त ही प्राण होता है ।।

यद्यपि रक्त पित्तदोष एवं तेजो महाभूत प्रधान है, तथापि इसके भौतिक संगठन में पाँचों महाभूत के गुणों का संयोग रहता है ।। यथा-
विस्रता द्रवता रागः लघुता स्पन्दनं तथा ।।
भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्रशोणिते ।।
अर्थात्- विस्रगन्धता, द्रवता, अरुणता, लघुता और स्पन्दन ये गुण क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, आकाश और वायु के रक्त में दिखाई पड़ते हैं ।।
पृष्ट संख्या:

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