पृष्ट संख्या:

सप्तधातु

    
रक्त का स्वरूप-
आयुवेर्द मतानुसार रक्त का वर्ण- तपाये हुए स्वर्ण, वीरबहूटी (लाल वर्ण का एक छोटा कृमि, वर्षा ऋतु में जो घास में होता है), रक्त कमल, गुंजाफल के समान, लाल वर्ण का विशुद्ध रक्त होता है ।

तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तसंतिभम्
गुञ्जाफल सवर्णं च विशुद्ध विद्वि शोणितम् (च. सू. २४/२२)
शुद्ध रक्त का वर्ण लाल होता है, जो समप्रकृति पुरुषों में होता है ।

स्वाभाविक रूप से रक्त में पिच्छिलता और सान्द्रता गुण होने के कारण वह एकदम पतला नहीं होता है, अपितु कुछ गाढ़ापन लिये होता है ।


रक्त का परिमाण-
''अष्टौ शोणितस्य'' (च. शा. ७/१५)
अपने हाथ की आठ अंजली प्रमाण होता है । जिसकी उत्पत्ति आयुवेर्द मत से यकृत, प्लीहा और आमाशय में कही गई है ।

रक्त के कार्य-
रक्तं वर्ण प्रसादं मांसपुष्टि जीवयति च (सु. सू. १५.५)
अर्थात् रक्त धातु वर्ण की प्रसन्नता या निमर्लता, अग्रिम मांसधातु की पुष्टि और शरीर को जीवित रखता है । इस प्रकार मुख्य तीन कार्य होते हैं, परन्तु सभी धातुओं का क्षय और वृद्धि होना रक्त के अधीन है

यथा-
तेषां (धातुनां) क्षयवृद्धौशोणितनिमित्ते ।

३. मांस धातु
शरीर में सबसे अधिक अंश मांस धातु का होता है और यह शरीर की स्थिरता, दृढ़ता और स्थिति के लिए महत्त्वपूर्ण होता है । मांस धातु के द्वारा शरीर के आकार निर्माण में सहायता प्राप्त होती है । शरीर का गठन, पुष्टता और सुविभक्त गात्रता मांस धातु के द्वारा ही होती है । मांस धातु अस्थियों को भी आधार प्रदान करता है ।

मांसपेशी के अभाव में अस्थि अथवा अस्थि संधि क्रियाशील नहीं हो सकती । अतः सभी सचल सन्धियों को क्रियाशीलता प्रदान करना मांसपेशियों के ही अधीन है । इसके अतिरिक्त अवयवों का निमार्ण मांसपेशियों के द्वारा ही होता है ।

शरीर के कुल भार का ४१ % मांस धातु है- इसमें २१% प्रोटीन तथा ५% जल होता है । यह पेशियों का उपादान धातु है । यह लोहित तंतुमय होता है तथा जोंक के शरीर की तरह सकुंचन प्रसरणशील होता है ।

पेशीनामुपादान धातुर्मृदुलोहित तन्तुमयो
जलौक शरीरवत् संकोचप्रसरण शीलः । (प्र.शा. अ. २)

मांसधातु का परिमाण-

शरीर में मांस धातु का परिमाण अन्य धातुओं की अपेक्षा सबसे अधिक होता है । आयुवेर्द में इसका निश्चित प्रमाण नहीं मिला; परन्तु आधुनिक मतानुसार सम्पूर्ण शरीर के भार का ४१ % भाग मांस का होता है ।


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