पृष्ट संख्या:

सप्तधातु

    
मांस धातु का भौतिक संगठन-
शरीर में मांस धातु का आधार मांसपेशी निरुपित किया गया है । यह एक पांचभौतिक द्रव्य है और विभिन्न महाभूतों के गुण इसमें पाये जाते हैं । यही कारण है कि पाँच भौतिक आहार के द्वारा उसका पोषण और वृद्धि होती है; तथापि सबसे अधिक पृथ्वी और जल महाभूतों का अंश मांस में पाया जाता है । मांस सवोर्त्तम मांसवद्धर्क होता है-

१. मांसमात्यायते मांसेन(च.शा.६/१०)
२. शरीरवृहणे नान्पत खाद्यं मांसाद्विशिष्यते (च.सू. २७/२८)
३. शुष्यतां क्षीणमांसनां कल्पितानि विधानवित् दद्यात्मांसादमांसनि वृहणानि विशेषतः (चि.चि. ९/४९)

मांस धात्वाग्नि की रक्त धातु के अणु भाग पर क्रिया होने के पश्चात् मांस धातु का निमार्ण होता है । मांस धात्वाग्नि की क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ मांस धातु तीन भागों में विभक्त होता है । अणु, स्थूल और मल भाग- इसमें स्थूल भाग के द्वारा मांस धातु का पोषण होता है ।

मांस धातु के कार्य-
मांस का कार्य चेष्टा करना है-
''मांसं शरीर पुष्टिं मेदसश्च ।'' (पुष्टिं करोति) (सु.सु. १५/५)

शरीर की विभिन्न क्रियाओं का संचालन यथा चलना- फिरना, उठना-बैठना आदि सभी कार्य मांस धातु के संकोच एवं प्रसरण के कारण ही सम्पन्न होते हैं । बिना मांस धातु के चल कार्य नहीं हो सकता ।

४. मेदधातु
मांस धातु के पोषण अंश या अणु भाग से मेद धातु की उत्पत्ति होती है । उस अंश पर मेदोधात्वाग्नि की क्रिया के परिणामस्वरूप जो अणु, स्थूल और मल इन तीन भागों का विभाजन होता है उसमें स्थूल भाग मेद धातु का पोषक होता है और वही मेद धातु की उत्पत्ति करने वाला होता है ।

मेद सान्द्र (घना) घी की तरह होता है और शरीर का स्नेह धातु है । मेद का अधिकांश स्थूलास्थियों (नलकास्थियों) में मज्जा नामक होता है । त्वचा के नीचे और मांस धरा कला के ऊपर मेदोधरा कला होती है । उदर में विशेष रूप से मेद का संग्रह होता है ।

सान्द्रसपस्तुल्यः स्नेहधातुः शरीरस्थ, तस्य स्थानमुदरान्तः त्वचामधश्च (प्र.शा.प्र.ख.अ. २)

मेद धातु का परिमाण के सम्बन्ध में कहीं विशेष विवरण नहीं है, क्योंकि भिन्न-भिन्न शरीर की भिन्न-भिन्न आकृति और प्रकृति होने के कारण मेदो धातु का परिमाण भी अलग-अलग होता है । अतः शारीरिक भिन्नता के कारण मेद धातु की निश्चित मात्रा बताना सम्भव नहीं है ।

मेद धातु के कार्य- मेद शरीर में स्नेह एवं स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है तथा शरीर की अस्थियों को पुष्ट करता है । मेद का कार्य शरीर में स्नेह को उत्पन्न कर सम्पूर्ण अंगों को स्निग्धता प्रदान करना है ।

''मेदः स्नेहस्वेदौ दृढ़त्वं पुष्टिमस्थ्नां च''(सु.सु. १५/५)

धातुओं के सामान्य कार्य के अनुसार शरीर धारण के अतिरिक्त पोषण कार्य भी मेद करता है । मेद स्वभावतः स्नेह प्रधान होने के कारण शरीर तथा विभिन्न अवयवों का पोषण करता है ।
मेदो धातु में स्थित स्नेहांश सन्धियों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह स्नेहांश ही सन्धियों को संशलिष्ट रखता है और सन्धियों में स्थित शैष्मिक कला के निमार्ण में सहायक होता है । जो हमारी सन्धियों को यथाशक्य स्नेहन कर गति प्रदान करने में सहायक बना रहता है ।

५. अस्थि धातु
शरीर की स्थिति एवं स्थिरता अस्थि संस्थान पर अवलम्बित है । अस्थि पंजर ही शरीर का सुदृढ़, ढाँचा तैयार करता है । जिससे मानव आकृति का निमार्ण होता है । शरीर में यदि अस्थियाँ न हों तो सम्पूर्ण शरीर एक लचीला मांस पिण्ड बनकर ही रह जायेगा, शरीर को अस्थियों के द्वारा ही दृढ़ता और आधार प्राप्त होता है ।

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