पृष्ट संख्या:

रस (षट्रस)

वस्तुतः हम जो भी खाद्य पदार्थ एवं वस्तुएँ ग्रहण करते हैं, उनमें से जिस स्वाद का ज्ञान जिह्वा के द्वारा होता है उसे ही रस कहते हैं ।।

'रसानार्थो रसः' इस उक्ति के अनुसार शब्द, स्पर्श, रूप आदि अन्य इन्द्रियों के अर्थों के समान रस जिह्वा इन्द्रिय का अर्थ है, क्योंकि रस का निश्चय जिह्वा पर पड़ने से ही होता है ।। इसलिए इसकी रस संज्ञा होती है तथा- रसेन्द्रिय के विषय को रस कहते हैं ।।

रसनार्थो रसः (च.सू.अ. १)
रसेरन्दि्र्यग्राह्यो योडर्थः स रसः (शि.)
रसस्तु रसनाग्राह्यो मधुरादिरनेकधा (का.)

अर्थात् जिस गुण का रसना के द्वारा ग्रहण होता है व रस कहलाता है ।। मधुर अम्ल आदि में पृथक वैशिष्ट्य होने पर भी सारतत्त्व सब में समान रूप से रहता है, अतः ये रस कहलाते हैं ।।

रस और उनका आश्रय- द्रव्य में रहने वाले मधुर अम्ल लवण कटु, तिक्त और कषाय ये छः रस हैं तथा इसमें जो रस जिस रस के पूर्व में रहता है, वह उससे बलवान होता है ।।
अर्थात् रसों की पहचान जीभ के ग्रहण करने पर ही होती है, यथा स्वाद से जैसी प्रतीति होती है मधुर, अम्ल, लवण या मीठा खट्टा नमकीन आदि ।।
'रसा स्वादाम्ललवणतिक्तोष्ण कषायकाः'
षड् द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्व बलावहाः ।(अ.स.सू.अ.१)


रसों की संख्या- रस छः हैं- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ।।
रसास्वात् षट् मधुराम्ललवण कटु तिक्त कषाय (च.चि. १)


इन्हें सामान्य बोलचाल की भाषा में क्रमशः मीठा, खट्टा, नमकीन, कडुआ, तीता और कसैला कहते हैं ।। इनके उदाहरण इस प्रकार हैं-

मधुर- गुड़, चीनी, घृत, द्राक्षा आदि ।।
अम्ल- इमली, नीबू, चांगेरी ।।
लवण-सैधंव समुद्र लवण आदि ।।
कटु- निम्ब, चिरायता, करेला आदि ।।
तिक्त- मरीच, लंका (लाल मिर्च) पिप्पली ।।
कषाय-हरीतकी, बबूल, घातकी ।।


रसों की संख्या के विषय में आचार्य कठोरता वादी हैं और उसमें परिवर्तन नहीं हो सकता ।। इसलिए रस छः ही हैं, न कम न अधिक ।। यद्यपि रसों की संख्या के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं, परन्तु मान्य छः रस ही हैं ।।

रसों का पञ्चभौतिकत्व- द्रव्य के समान रस भी पंचभौतिक हैं ।। जल तो मुख्य रूप से और पृथ्वी जलवायु प्रवेश के कारण अप्रत्यक्ष रूप से रस का समयवी कारण है ।। इसके अतिरिक्त आकाश, वायु और अग्नि ये तीन महाभूत रस की सामान्य अभिव्यक्ति तथा वैशिष्ट्य में निमित्त कारण होते हैं ।। इस प्रकार पाँचों महाभूत रस के कारण तथा सम्बद्ध है ।। द्रव्य और रस दोनों पंचभौतिक होने के कारण द्रव्य अनेक रस होते हैं ।। वस्तुतः रस जलीय है और पहले अव्यक्त रहता है, वही एक आप्य रस काल के छः ऋतुओं में विभक्त होने के कारण पंचमहाभूतों के न्यूनाधिक गुणों से विषम मात्रा में विदग्ध होकर मधुर आदि भेद से अलग छः प्रकारों में परिणत हो जाता है ।। अतः रसों की उत्पत्ति पंचमहाभूतों के द्वारा ही होती है ।।

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