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त्रिदोष

परिचय एवं लक्षण

त्रिदोष अर्थात तीन दोष यानि वात, पित्त, कफ़ इसी को महर्षि वाग्भट्ट ने कहा है कि

वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ।(अ.स.सू.प्र.अ.)

क्योंकि ये शरीर को दूषित करते हैं इसलिए इन्हें दोष कहा जाता है ।।

''दूषणाद्दोषाः'' -- इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो शरीर को दूषित करते हैं वे दोष हैं, ये दोष शरीर को तभी दूषित करते हैं जब स्वयं विकृत हो जाते हैं ।।

प्राकृतावस्था में तो दोष धातु, मल ही शरीर को धारण करते हैं ।।
इसीलिए ''दोष धातु मल मूलं हि शरीरम्'' कहा गया है ।। किन्तु शरीर को दूषित करने के कारण ही इन्हें दोष नाम से वर्णित किया गया है ।। परन्तु सदैव ये इसी रूप में नहीं रहते ।।

साम्यावस्था प्रकृति- जब ये प्राकृतावस्था में रहते हैं, तब शरीर को धारण करते हैं, इसीलिए समावस्था में स्थित वात्, पित्त, कफ़ को धातु कहते हैं ।।

और जब ये शरीर धारण के लिए अनुपयुक्त होकर शरीर को मलिन करते हैं तब इन्हें मल कहते हैं ।।
इस प्रकार अवस्था भेद से वात, पित्त और कफ़ के लिए दोष, धातु और मल इन तीनों संज्ञाओं का व्यवहार होता है ।। ये दोष शरीर को तभी दूषित करते हैं जब स्वयं विकृत होते हैं ।। दूषित होने पर शरीर में अनेक तरह के विकार उत्पन्न करते हैं ।।

वैदिक वाङ्मय में त्रिदोष संबंधी निम्न मत मिलते हैं :- यथा- अथर्ववेद में वात, पित्त, कफ़ को रसादि सप्तधातुओं का निर्माणकर्ता तथा शरीरोत्पत्ति का कारण कहा गया है ।।

चरक संहिता में कहा गया है कि वात, पित्त और कफ़ ये त्रिदोष प्राणियों के शरीर में सर्वदा रहते हैं ।। शरीर के प्रकृति भूत ये त्रिदोष आरोग्य प्रदान करते हैं तथा विकृत होने पर ये विकार कहे जाते हैं ।। 'त्रिदोष का प्रकृतिस्थ रहना ही आरोग्य है ।। ''

दोषा पुनस्त्रयो वात पित्त श्लेष्माणः ।।
ते प्रकृति भूताः शरीरोपकारका भवन्ति ।।
विकृतिमापन्नास्तु खलु नानाविधैविर्कारेः शरीरमुपतापयन्ति ।(च०वि०अ०१)

अर्थात्- प्राकृतावस्था में लाभकारी और विकृति आने पर शरीर में रोगोत्पत्ति दोषों के ही परिणामस्वरूप होती है ।। अर्थात् इनकी साम्यावस्था ही स्वस्थता का प्रतीक है और इसमें परिवर्तन होना विकार का कारण ।। यथा- ''रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यरोगतां ।''

अतः इन दोषों में परिवतर्न आना ही रोग का मूल कारण होता है ।। अनेक प्रकार के मिथ्याहार-विहारों के सेवन करने पर भी यदि मनुष्य की क्षमता के आधार कारण दोष का कोप न हो अथवा स्वल्प मात्रा में दोष कुपित हो, तब रोग की संभावना नहीं होती ।। इसी बात को वाग्भट्ट ने कहा है-
सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः ।।
तत प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधः हितसेवनम् ।।
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