ध्यान

ध्यान साधक के लिए ही आदर्शो को दिव्य रूपधारी देवताओं के रूप में मानकर उनमें मानसिक तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है। प्रीति सजातियों में होती है। इसलिए लक्ष्य रूप इष्ट को दिव्य देहधारी देव मानकर उसमें तन्मय होने का गढ़ एवं रहस्यमय मनोवैज्ञानिक आधार स्थापित करना पड़ा है। एक-एक अभिलाषा एवं आदर्श का प्रतीक सावित्री मानी गई है। गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना स्वधा, स्वाहा, मातर, लोक-मातर, धृष्टि, तुष्टि, पुष्टि, आत्मदेवी यह षोडश मातृकाएँ प्रसिद्ध हैं। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रधण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी कालरात्रि, महागौरी, सिद्धदात्री यह नव दुर्गाएँ अपनी- अपनी विशेषताओं के कारण हैं।

ध्यान-योग साधना में मन की एकाग्रता के साथ-साथ लक्ष्य को, इष्ट को भी प्राप्त करके योगस्थिति उत्पन्न करने का दुहरा लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इसलिए इष्टदेव का मन:क्षेत्र में उसी प्रकार ध्यान करने का विधान किया गया है। ध्यान के पाँच अंग हैं। १-स्थिति, २-संस्थिति, ३-विगति, ४-प्रगति, ५-सस्मिति। इन पर कुछ प्रकाश डाला जाता है।

१- स्थिति का तात्पर्य हैं- साधक की उपासना करते समय की स्थिति। मन्दिर में, नदी, तट पर एकान्त में, श्मशान में स्नान करके, बिना स्नान किए पद्मासन से, सिद्धासन से किस ओर मुँह करके, किस मुद्रा में, किस समय, किस प्रकार ध्यान किया जाय ? इस सम्बन्ध की व्यवस्था को स्थिति कहते है।

२-संस्थिति का अर्थ- इष्टदेव की छवि का निर्धारण। उपास्य देव का मुख आकृति, आकार मुद्रा, वस्त्र, आभूषण, वाहन, स्थान, भाव को निश्चित करना संस्थिति कहलाती है।

३- विगति कहते हैं- गुणावली को। इष्टदेव में क्या विशेषताएँ, शक्तियाँ, सामर्थ्य, परम्पराएँ एवं गुणावलियाँ हैं ? उनको जानना विगति कहा जाता है।

४-प्रगति कहते हैं- उपासना काल में साधक के मन में रहने वाली भावना को। दास्य, सखा, गुरु, बन्धु मित्र, माता-पिता, पति, पुत्र, सेवक, शत्रु आदि जिस रिश्ते को उपास्य देव को मानना हो उस रिश्ते की स्थिरता तथा उस रिश्ते को प्रणाढ़ बनाने के लिए इष्टदेव को प्रमुख ध्यानावस्था में, अपनी आन्तरिक भावनाओं को विविध शब्दों तथा चेष्टाओं द्वारा उपस्थित करना प्रगति कहलाती है।

५- 'सस्मिति' वह व्यवस्था है जिसमें साधक और साध्य उपासक और उपास्य, एक हो जाते हैं। दोनों में कोई भेद नहीं रहता है। भृंग कीट की सी तन्मयता द्वैत के स्थान पर अद्वैत की झाँकी, उपास्य और उपासक का अभेद, मैं स्वयं इष्टदेव हो गया हूँ या इष्टदेव में पूर्णतया लीन हो गया हूँ ऐसी अनुभूति का होना। अग्नि में पड़कर जैसे लकड़ी भी अग्निमय लाल वर्ण हो जाती है, वैसी ही अपनी स्थिति जिन क्षणों में अनुभव होती है उसे 'संस्मिति' कहते हैं।

ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने की, वश में करने की विधि बताना मात्र है। इसके लिए कुछ ध्यान नीचे दिये जाते हैं-१- चिकने पत्थर की या धातु की सुन्दर-सी गायत्री प्रतिमा लीजिए। उसे एक सुसज्जित आसन पर स्थापित कीजिए। प्रतिदिन उसका जल, धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प आदि... See More

एकान्त स्थान में इस तरह बैठें, जिससे नाड़ियों पर तनाव न पड़े। भावना करें कि मेरी आत्मा यथार्थ में एक स्वतन्त्र पदार्थ है। वह अनन्त बल वाला, अविनाशी और अखण्ड है। वह एक सूर्य है, जिसके इर्द- गिर्द हमारा संसार बराबर घूम रहा है, जैसे सूर्य के चारों ओर नक्षत्र... See More

प्रातःकाल पूर्व दिशा- अरूणिम आकाश- स्वर्णिम सूर्योदय।-स्वर्णिम सूर्य- सविता। सविता तेजस्वी परब्रह्म।-सविता ब्रह्म। प्रकाश- ज्ञान सविता वर्चस्। अग्नि- ऊर्जा प्रखरता।-सविता- ब्रह्म वर्चस्। उपास्य। आराध्य। इष्ट। लक्ष्य।-साधक पर सविता शक्ति की अनन्त अन्तरिक्ष से शक्ति वर्षा। अमृत वर्षा।-अमृत वर्षा से आत्म सत्ता- विकसित, पुलकित, उल्लसित।-संव्याप्त आत्म सत्ता में समर्थता सजगता सरसता।-साधक... See More

हिमालय के उत्तुंग शिखर ।। हिमाच्छादित प्रदेश। ब्रह्म चेतना के धरती पर अवतरित होने का ध्रुव केन्द्र।-मध्यवर्ती मान सरोवर। अमृत तत्व से भरपूर। शीतल, सुगन्धित, सशक्त विशेषताओं से परिपूर्ण ।। नीलम अगाध जल राशि।-मान सरोवर में हंस वाहिनी गायत्री माता का प्राकट्य। सौम्य मुद्रा। मधुर मुस्कान। मुख मण्डल पर स्वर्णिम... See More



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