महाभारत

महाभारत में भी गायत्री मंत्र की महिमा कई स्थानों पर गायी गयी है ।। यहाँ तक कि भीष्म पितामह युद्ध के समय अन्तिम शरशय्या पर पड़े होते हैं तो उस समय अन्तिम उपदेश के रूप में युधिष्ठिर आदि को गायत्री उपासना की प्रेरणा देते हैं ।।  भीष्म पितामह का यह उपदेश महाभारत के अनुशासन पर्व के अध्याय 150 में दिया गया है ।।

युधिष्ठिर पितामह से प्रश्न करते हैं
पितामह महाप्राज्ञ सर्व शास्त्र विशारद ।।
कि जप्यं जपतों नित्यं भवेद्धर्म फलं महत ॥
प्रस्थानों वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वाणी कर्मणि ।।
देवें व श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्म साधनम ॥
शान्तिकं पौष्टिक रक्षा शत्रुघ्न भय नाशनम् ।।
जप्यं यद् ब्रह्मसमितं तद्भवान् वक्तुमर्हति ॥
(महाभारत, आ.प.अ. 150)

'हे सभी शास्त्रों के विशारद महाप्राज्ञ पितामह ! कौन से मंत्र को सदा जपने से विशेष धर्म फल मिलता है ।। किसी कार्य को आरंभ करते समय चलते- फिरते देवताओं के श्रद्धा- सत्कार मे कौन सा मंत्र अधिक लाभकारी होता है ।। वह कौन सा मंत्र है जिसके जपने से शान्ति, पुष्टि, सुरक्षा, शत्रु हानि तथा निर्भय होते हैं ओर जो वेद सम्मत हो कृपया उसका वर्णन कीजिए ।'



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