यज्ञ के लाभ

यज्ञों की भौतिक और आध्यात्मिक महत्ता असाधारण है। भौतिक या आध्यात्मिक जिस क्षेत्र पर भी दृष्टि डालें उसी में यज्ञ की महत्वपूर्ण उपयोगिता दृष्टिगोचर होती है। वेद में ज्ञान, कर्म, उपासना तीन विषय हैं। कर्म का अभिप्राय-कर्मकाण्ड से है, कर्मकाण्ड यज्ञ को कहते हैं। वेदों का लगभग एक तिहाई मंत्र भाग यज्ञों से संबंध रखता है। यों तो सभी वेदमंत्र ऐसे हैं जिनकी शक्ति को प्रस्फुरित करने के लिए उनका उच्चारण करते हुए यज्ञ करने की आवश्यकता होती है।

(1) मनुष्य शरीर से निरन्तर निकलती रहने वाली गंदगी के कारण जो वायु मण्डल दूषित होता रहता है, उसकी शुद्धि यज्ञ की सुगन्ध से होती है। हम मनुष्य शरीर धारण करके जितना दुर्गन्ध पैदा करते हैं उतनी ही सुगन्ध भी पैदा करें तो सार्वजनिक वायु-तत्व को दूषित करने के अपराध से छुटकारा प्राप्त करते हैं।

(2) यज्ञ धूम्र आकाश में जाकर बादलों में मिलता है उससे वर्षा का अभाव दूर होता है। साथ ही यज्ञ धूम्र की शक्ति के कारण बादलों में प्राणशक्ति उसी प्रकार भर जाती है जिस प्रकार इन्जेक्शन की पिचकारी से थोड़ी-सी दवा भी शरीर में प्रवेश करादी जाय तो उसका प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है।

(3) यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्व वायु मण्डल में फैलाये जाते हैं उनसे हवा में घूमते हुए असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। डी.डी.टी., फिनाइल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने की दवाएं या सुइयां लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। मनुष्यों की ही नहीं, पशु पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है।

(4) यज्ञ द्वारा प्रथक-प्रथक रोगों की भी चिकित्सा हो सकती है। यज्ञ तत्व का ठीक प्रकार उपयोग करके अन्य चिकित्सा पद्धतियों के मुकाबिले में अधिक मात्रा में अधिक शीघ्रतापूर्वक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

(5) यज्ञ द्वारा विश्वव्यापी पंच तत्वों की, तन्मात्रों की, तथा दिव्य शक्तियों की परिपुष्टि होती हैं। इसके क्षीण हो जाने पर दुखदायी असुरता संसार में बढ़ जाती है और मनुष्यों को नाना प्रकार के त्रास सहने पड़ते हैं। देवताओं का—सूक्ष्म जगत के उपयोगी देवतत्वों का भोजन यज्ञ है। जब उन्हें अपना आहार समुचित मात्रा में मिलता रहता है तो वे परिपुष्ट रहते हैं और असुरता को, दुख दारिद्र को दबाये रहते हैं।

(6) यज्ञ में जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है उन की शक्ति असंख्यों गुनी अधिक होकर संसार में फैल जाती है, और उस शक्ति का लाभ सारे विश्व को प्राप्त होता है। गायत्री मंत्र की सद्बुद्धि शक्ति को यज्ञों के द्वारा जब आकाश में फैलाया जाता है तो उसका प्रभाव समस्त प्राणियों पर पड़ता है और वे सद्बुद्धि से, सद्भावना से, सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित होते हैं।

(7) यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अन्तःकरण पर देवत्व की छाप डालती है। जहां यज्ञ होते हैं वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहां जाने वालों पर भी दीर्घ काल तक प्रभाव डालती रहती है। प्राचीन काल में तीर्थ वहीं बने हैं जहां बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे।

(8) कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से व्यक्तियों की मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पाप नाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।

(9) यज्ञों की शोध की जाय तो प्राचीन काल की भांति यज्ञ शक्ति से सम्पन्न अग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सम्मोहनास्त्र, आदि अस्त्र शस्त्र पुष्पक विमान जैसे यंत्र, बन सकते हैं, अनेकों ऋद्धि सिद्धियों को उपलब्ध किया जा सकता है। प्रखर बुद्धि सुसंतति, निरोगता एवं सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। प्राचीन काल की भांति यज्ञीय लाभ पुनः प्राप्त हों इसकी शोध के लिए यह आवश्यक है कि जनसाधारण का ध्यान इधर आकर्षित हो और साधारण यज्ञ आयोजनों का प्रचार बढ़े।

(10) यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेप शुद्ध होते हैं। फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश आने लगता है। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्व, ऋषितत्व की वृद्धि दिन-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम-लक्ष बहुत सरल हो जाता है।

(11) यज्ञ त्यागमय जीवन के आदर्श का प्रतीक है। इदन्न मम—(यह मेरा नहीं सम्पूर्ण समाज का है) इन भावनाओं के विकास से ही हमारा सनातन आध्यात्मिक समाजवाद जीवित रह सकता है।

(12) यज्ञ हमारा सर्वोत्तम शिक्षक है जो अपना आदर्श अपनी क्रिया से स्वयं ही प्रकट करता रहता है:
 (1) अग्नि का स्वभाव है कि सदा उष्णता और प्रकाश धारण किये रहती है हम भी उत्साह, श्रमशीलता, स्फूर्ति, आशा एवं विवेक शीलता की गर्मी और रोशनी अपने में धारण किये रहें।
(2) अग्नि में जो वस्तु पड़ती है उसे वह अपने समान बना लेती है, हम भी अपने निकटवर्ती लोगों को अपने समान सद्गुणी बनावें।
(3) अग्नि की ज्योति सदा ऊपर को ही उठती है, उलटने पर भी मुंह नीचे को नहीं करती, हम भी विषम परिस्थितियां आने पर भी अधोगामी न हों वरन् अपने आदर्श ऊंचे ही रखें।
(4) अग्नि कोई वस्तु अपने पास नहीं रखती वरन् जो वस्तु मिली उसे सूक्ष्म बना कर आकाश में फैला देती है, हम भी उपलब्ध वस्तुओं को अपने लिये ही न रखें वरन् उन्हें समाज के हित में वितरण करते रहें।
 (5) अग्नि को ही यह शरीर भेंट किया जाने वाला है, इसलिये चिता का सदा स्मरण रखें, मृत्यु को सामने देखें, और सत्कर्मों में शीघ्रता करने एवं दुष्कर्मों से बचने को तत्पर रहें। इन भावनाओं के प्रतिनिधि रूप में यज्ञाग्नि की पूजा की जाती है।

(13) अपनी थोड़ी सी वस्तु को सूक्ष्म वायु रूप बना कर उन्हें समस्त जड़ चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने पराये, मित्र शत्रु का भेद किये सांस द्वारा इस प्रकार गुप्त दान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्व खिला दिया—सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है। कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है।

(14) यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। अन्य उपासनाएं या धर्म प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो अकेला कर या करा सकता है पर यज्ञ ऐसा कार्य है जिसमें अधिक जनता के सहयोग की जरूरत है। होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों में सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएं विकसित होती हैं।

(15) आपत्ति काल में, अनिष्ट निवारण में, कुसमय में, रक्षात्मक शांति शक्ति के रूप में यज्ञों का बड़ा महत्व है। वर्तमान काल में एटम युद्ध जैसी सत्यानाशी आसुरी संहार लीलाओं की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही हैं। सन् 62 में एक राशि पर 8 ग्रह आने का कुयोग भी अशुभ सूचक है।

(16) हिंदू जाति का प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व, त्यौहार संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है। यज्ञ भारत की सर्वमान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है।

(17) यों यज्ञ सभी अच्छे हैं पर प्रथक-प्रथक यज्ञों के उद्देश्य और परिणाम भिन्न-भिन्न हैं। वर्षा का अभाव दूर करने के लिये विष्णुयज्ञ, विलासिता त्यागने और भक्ति भावना बढ़ाने के लिये रुद्रयज्ञ, बीमारियों को रोकने के लिये मृत्युंजय यज्ञ और लड़ाई के समय जनता में जोश भरने के लिये चण्डीयज्ञ कराये जाते हैं।

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