यज्ञों के विविध प्रकार

 गीता-3/9 भगवान् ने सभी कार्यों को बन्धन स्वरूप बतलाया है परन्तु यज्ञ को- यज्ञार्थात् कर्मणो...न्यत्र लोको....यं कर्मबन्धनः॥ -गीता ३
कहकर बन्धन कारक नहीं बताया है । अतएव इसे बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले पावनानि मनीषिणाम् कार्यों में परिगणित किया है ।

श्रौतयज्ञ

श्रौतयज्ञों के विधान की एक स्वतंत्र परम्परा है, उस प्रयोग परम्परा का जिस कार्य में पूर्णतया उललेख हो उसे 'प्रकृतियाग' कहते हैं और जिस कार्य में विशेष बातों का उल्लेख और शेष बातें प्रकृतियोग से जानी जाएँ उसे 'विकृतियाग' कहते हैं अतएव श्रौतयज्ञों के तीन मुख्य भेदों में क्रमशः दर्शपूर्णमासेष्टि, अग्नीपोमीय पशुयाग, और ज्योतिष्टोम सोमयाग ये प्रकृतियाग हैं । अर्थात् इन कर्मों में किसी दूसरे कर्म से विधि का ग्रहण नहीं होता । इन प्रकृतियागों के जो धर्म ग्राही विकृतियाग हैं वे अनेक हैं ।

स्मार्त यज्ञ

स्मार्त यज्ञ का आधार भूत अग्नि शास्त्रीय और लौकिक दोनों प्रकार का होता है । शास्त्रीय अर्थात् आधान विधि के द्वारा स्वीकृत अग्नि औपासन, आवसथ्य, गृह्य, स्मार्त आदि शब्दों से कहा जाता है ।

पौराणिक यज्ञ

 पौराणिक कार्यों में यज्ञ शब्द का प्रयोग कल्प सूत्रकारों की याज्ञिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है । परन्तु गीता के व्यापक क्षेत्र से इनके लिए भी 'यज्ञ' शब्द का व्यवहार होता है । अतएव पौराणिक यज्ञों को हवन, दान, पुरश्चरण, शान्तिकर्म, पौष्टिक, इष्ट, पूर्त्त व्रत, सेवा, आदि के रूप से अनके श्रेणियों में विभक्त किया गया है ।

Introduction The Yug Nirman Movement was launched under the guidance of Param Pujya Gurudev Pt. Shriram Sharma Acharya on the solid foundation of Gayatri and Yagya, the two pillars of divine Indian heritage. This movement has spread with lightning speed throughout the world. Keeping in view the need of the... See More



अपने सुझाव लिखे: