पृष्ट संख्या:

सप्तधातु

    
अस्थि में पृथ्वी, आकाश एवं वायु महाभूत की अधिकता होती है । अस्थि में स्थूलता और उसमें प्रतीत होने वाली गंध पृथ्वी महाभूत की स्थिति को बतलाती है । लघुता और सुषिरता आकाश महाभूत तथा रुक्षता वायु महाभूत के कारण होती है-

आकार विशेषतः तेजस महाभूत के कारण होता है । अस्थियाँ स्थिर, कठिन एवं शरीर की अवलम्बक धातु है जो मांसपेशियाँ स्नायुयों द्वारा अस्थियों पर निबद्ध होती है, जिनके समागम स्थल को सन्धि कहते हैं ।

ये संधियाँ दो प्रकार की होती हैं- चल सन्धि और स्थिर सन्धि शाखाओं हनु, कटि, ग्रीवा में चल तथा स्थिर सन्धियाँ होती हैं ।

अस्थिनि नाम स्थिर कठिनावलम्बनोधातुः
कायस्य यमाश्रित्य समग्रं शरीरमवतिष्ठते(प्र.शा.ख. अ. २)

अस्थियों का ही सजातीय रूप तरुणास्थि है । स्थिति स्थापक और नम्र-लचीली होती हुई भी यह सुदृढ़ होती है-

ये प्रायः समस्त अस्थियों का पूवर्रूप होती है- क्लोम तथा कण्ठ (स्वरयंत्र) तरुणास्थि से ही बने होते हैं ।
पर्शुकाओं का उरः फलक से संधान तरुणास्थि से ही होता है । नासिका का अग्रभाग, कणर्शष्कुली तथा अधिजिह्विका तरुणास्थि से ही बने होते हैं । अस्थियों के सिरे तरुणास्थियों से ही बने होते हैं ।

अस्थियों के कार्य- मूल रूप से दो ही कार्य हैं- देह को धारण करना और मज्जा की पुष्टि करना । शरीर को आधार प्रदान करना और अपने सामान्तर अवयव को पुष्टि करना । शरीर के विभिन्न भागों में स्थित मृदु और आघात असहिष्णु अवयवों की रक्षा करना है ।

मस्तिष्क, हृदय और फुफ्फुस की रक्षा का दायित्व मुख्य रूप से अस्थियों पर ही निभर्र है ।

६ मज्जा धातु
मज्जा धातु मुख्य रूप से स्नेहांश प्रधान द्रवरूप में होता है । यह कुछ पीलापन लिए हुए होता है । यह धातु विशेष रूप से बड़ी अस्थियों में उनके मध्य में पाया जाता है । छोटी अस्थियों में पाई जाने वाली मज्जा का वर्ण कुछ रक्ताभ लिये हुए होता है ।

अस्थि धातु के अणु भाग से मज्जा धातु की उत्पत्ति होती है । इसमें स्नेहांश और द्रवांश की अधिकता के कारण जल महाभूत की अधिकता लक्षित होती है ।

मज्जा के कर्म- शरीर में त्वचा की स्निग्धता मज्जा धातु के ही अधीन है । शरीर में बल उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण कार्य मज्जा के द्वारा सम्पन्न होता है । मज्जा का अग्रिम धातु शुक्र होती है, अतः उसकी पुष्टि करना भी मज्जा का ही कार्य है । शुक्र की पुष्टि करना, अस्थियों के सुषिर भाग की पूरण करना आदि मज्जा के प्रमुख कार्य हैं ।

यह विशेष रूप से शुक्र धातु का पोषण, शरीर का स्नेहन तथा शरीर में बल सम्पादन का कार्य करता है । मज्जा शरीर के विभिन्न अवयवों को पोषण प्रदान करती है, यह पोषण का कार्य मुख्य रूप से इसके स्नेहांश के द्वारा किया जाता है ।

मज्जा के कारण शरीर और अस्थि दोनों को बल प्राप्त होता है । इस प्रकार यह स्वयं तथा अस्थियों के माध्यम से शरीर को धारण करती है ।

७. शुक्र धातु
शरीर में ऐसा कोई स्थान विशेष नियत नहीं है जहाँ शुक्र विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है तथा शरीर को बल प्रदान करता है । इसके लिए कहा गया है, जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने में गुड़ व्याप्त रहता है, उसी प्रकार शरीर में शुक्र व्याप्त रहता है । महर्षि चरक के अनुसार शुक्र का आधार मनुष्य का ज्ञानवान शरीर है ।

शुक्र का स्वरूप-
स्फटिकामं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धिच ।
शुक्रमिच्छन्ति केचित्तुु तेलक्षौद्रनिमं तथा॥ (सुश्रुत)

स्फटिक के समान श्वेत वर्ण वाला द्रव स्निग्ध, मधुर और मधु के समान गन्धवाला शुक्र होता है । कुछ विद्वानों के अनुसार तैल या मधु के समान शुक्र होता है ।

शुक्र की उत्पत्ति मज्जा धातु के अणु भाग पर शुक्र धात्वाग्नि की क्रिया के परिणाम स्वरूप होता है । शुक्र की उत्पत्ति का कार्य दोनों वृषण करते हैं । शुक्र सवर्शरीस्थ है । जिस प्रकार ईख में रस, दूध या दही में घी या तिल में तेल अदृश्य रूप में सर्वांश में ओत-प्रोत होता है वैसे ही शुक्र मनुष्य के सर्वांग में व्याप्त होता है । यथा-यथा पयसि सपस्तु गूढ़श्चेक्षौ रसो यथा

शरीरेषु तथा शुक्र नृणां विद्यद्भिषग्वरः(सु.शा. ४/२१)
रस इक्षौ यथा दहिन सपस्तैलं तिले यथा ।
सवर्त्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पशर्ने तथा॥(च. चि. ४/४६)

शुक्र के कार्य- धैर्य- अथार्त् सुख, दुःखादि से विचलित न होना, शूरता, निभर्यता, शरीर में बल उत्साह, पुष्टि, गभोर्त्पत्ति के लिए बीज प्रदान तथा शरीर को धारण करना, इन्द्रिय हर्ष, उत्तेजना, प्रसन्नता आदि कार्य शुक्र के द्वारा होते हैं । इस प्रकार शुक्र धातु शरीर के साथ-साथ मन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है । इन सबके अतिरिक्त सबसे मुख्य कार्य सन्तानोत्पत्ति है ।
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