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👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 1)

🔷 इन तीनों को झिड़को :- निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता-

🔶 ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

🔷 घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता। कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है।

🔶 दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

गुरुपूर्णिमा पर्व सोत्साह मनायें, श्रद्धा को जीवन्त बनायें

गुरुकृपा का पूरा लाभ उठायें, मनोकामना पूर्ति ही नहीं, चित्तवृत्तियों का शोधन भी करायें

पर्व का सार्थक उपयोग
पर्व आते हैं, एक उत्साहवर्धक वातावरण बनाते हैं। उनका क्षणिक, सामयिक लाभ ही अधिकांश लोग उठा पाते हैं। उनके द्वारा बनाये गये वातावरण और जमाये गये उल्लास का दीर्घगामी या स्थाई लाभ कितने लोग उठा पाते हैं? प्रयास यह किया जाना चाहिए कि उस वातावरण और उल्लास का उपयोग अपने व्यक्तित्व के परिष्कार एवं विकास के लिए किया जा सके। ऐसा किया जा सके तो प्रत्येक पर्व हमें एक ऐसा अनुदान देकर जायेगा जो हमें दीर्घकालीन, स्थाई लाभ देने में समर्थ हो।

गुरुपूर्णिमा पर्व मनाइये, उत्सव- उल्लास का माहौल बनाइये, गुरु की कृपा की महिमा के गीत गाइये, किन्तु उनका समुचित लाभ भी उठाइये, अपनी श्रद्धा को अधिक परिष्कृत और जीवन्त बनाइये।
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संरक्षक संस्थापक

एक सन्त, युगपुरुष, दृष्टा, सुधारक आचार्य श्रीराम शर्मा जिन्होने युग निर्माण योजना आन्दोलन का सूत्रपात किया। जिन्होने तपस्या का अनुशासित जीवन जीते हुए आध्यात्मिक श्रेष्ठता प्राप्त कर समस्त मानवता को प्रेरित किया । जिन्होने बदलते समय के अनुसार हमारे दृष्टिकोण को, विचारों को, संवेदनशीलता का विस्तार करने के लिये, जीवन को बदलने के लिये सत्साहित्य का सृजन किया ।

परम पूज्य गुरुदेव एक ऐसे साधक, द्रष्टा, विचारक रहे हैं, जिनको व्यक्ति, परिवार, समाज और देश-विदेश में घट रही अथवा घटने वाली घटनाओं की तह में जाकर उन्हें आर-पार देखने की अलौकिक सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त थी। जो दृश्य-अदृश्य जगत् की विविध परिस्थितियों को निमिष मात्र में भाँपकर उन्हें नियन्त्रित कर लेते थे।

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वास्तव में दुर्लभ और व्यावहारिक लेखन गायत्री मंत्र, साधना और यज्ञ विज्ञान पर .

अद्वितीय आंदोलनविचार क्रांति के पहले ही मुद्दे के साथ "अखण्ड ज्योति " 1939 में पहली पुस्तक में उन्होंने लिखा था "में क्या हूँ ? ", वास्तविक में एक उपनिषद स्तर के काम आत्म के ज्ञान पर ।

पूरा ग्रंथ, हिन्दी, पूरे वैदिक इंजील (वेद, उपनिषद, दर्शन , पुराण और स्मृति की )

प्रमुख पुस्तकालयों द्वारा मान्यता : इन्क्लूडिंग आई .आई.टी मुम्बई , स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया , सिडनी यूनिवर्सिटी ,वेस्टर्न रेलवे हिंदी डिवीज़न -मुम्बई , भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट -पुणे

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