एक सन्त, युगपुरुष, दृष्टा, सुधारक आचार्य श्रीराम शर्मा जिन्होने युग निर्माण योजना आन्दोलन का सूत्रपात किया। जिन्होने तपस्या का अनुशासित जीवन जीते हुए आध्यात्मिक श्रेष्ठता प्राप्त कर समस्त मानवता को प्रेरित किया
"अपना सुधार
संसार की सबसे बडी सेवा है"
जिन्होने बदलते समय के अनुसार हमारे दृष्टिकोण को, विचारों को, संवेदनशीलता का विस्तार करने के लिये, जीवन को बदलने के लिये सत्साहित्य का सृजन किया |
परिवर्तन के उत्प्रेरक
शांति के नए युग के लिए
गायत्री परिवार जीवन जीने कि कला के, संस्कृति के आदर्श सिद्धांतों के आधार पर परिवार,समाज,राष्ट्र युग निर्माण करने वाले व्यक्तियों का संघ है।
वसुधैवकुटुम्बकम् की मान्यता के आदर्श का अनुकरण करते हुये हमारी प्राचीन ऋषि परम्परा का विस्तार करने वाला समूह है गायत्री परिवार।
एक संत, सुधारक, लेखक, दार्शनिक, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा स्थापित यह मिशन युग के परिवर्तन के लिए एक जन आंदोलन के रूप में उभरा है
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- विश्व मे ४००० से अधिक केन्द्र
- करोडो परिजनो द्वारा अपनाया हुआ मिशन
- लाखों व्यक्तियों को आध्यामिक दिशाधारा देने वाला मिशन
- नारी जागरण के आन्दोलन की रूपरेखा बनाने व गतिशील करने वाला मिशन
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विज्ञान और अध्यात्म ज्ञान की दो धारायें हैं जिनका समन्वय आवश्यक हो गया है। विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय हि सच्चे अर्थों मे विकास कहा जा सकता है और इसी को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद कहा जा सकता है ..
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आध्यात्मिक जीवन शैली पर आधारित, मानवता के उत्थान के लिये वैज्ञानिक दर्शन और उच्च आदर्शों के आधार पर पल्लवित भारतिय संस्कृति और उसकी विभिन्न धाराओं (शास्त्र, योग ,आयुर्वेद,दर्शन) का अध्ययन करें ..
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ईश्वर और उसका अस्तित्व
जिस प्रकार व्यवहार संसार में होने वाली हलचलों को संचालन जीव है, उसी प्रकार इस विश्व ब्रह्मण्ड का, पंच तत्वों को ,निर्माता एवं संचालन परमेश्वर हैं । शरीर के भीतर रहने वाली चेतन-सत्ता आत्मा कहलाती है और विश्व शरीर के भीतर रहने वाली चेतना को परमात्मा कहते हैं यदि परमात्मा न हो या निष्क्रिय हो जाय तो विश्व की समस्त शक्तियाँ एवं व्यवस्थायें विश्वश्रृखलित हो जायँ और प्रलय होने में क्षणभर की भी देर न लगे ।
जिस प्रकार किसी मशीन का संचालन बिजली द्वारा, शरीर का जीव द्वारा होता है, उसी प्रकार समस्त विश्व की सक्रियता परमात्मा की उपस्थिति के कारण ही है । सूर्य चन्द्रमा का समय निकलना, अस्त होना, दिन और रात का नियमित रीति से बदलना, ऋतुओं का परिवर्तन, भूमि की उर्वरता, पवन की गतिशीलता, जल की आर्द्रता शरीरों एवं पेड़-पौधों का जन्म, वृद्धि एवं मरण का क्रम जीवों एवं बीजों द्वारा अपनी ही जाति के प्रजनन, ईथर आकर्षण आदि विभिन्न सूक्ष्म शक्तियों का अपने-अपने ढंग से नियमित संचरण आदि को गम्भीरता से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इस विश्व का नियाम एवं संचालक कोई चेतन-तत्त्व है...
कठिन समस्याओं के सरल समाधान
इन दिनों पतन-पराभव का संकट, विग्रह का संकट, विग्रह का वातावरण बन कर खड़े हुए अराजकता स्तर के असमंजसों की चर्चा विगत पृष्ठों पर की गई है। इनका निवारण-निराकरण इन्हीं दिनों किया जाना आवश्यक है। देर करने का समय है नहीं, अन्यथा अवसर चूकने पर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा नहीं। क्षयजन्य रुग्णता को दूर करने की प्राथमिकता तो दी जाती है पर अगला कदम यही होता है कि रुग्णता से क्षीण, जर्जर काया को सही स्थिति मंन लाया जाए और जीवनी शक्ति को इतना बढ़ाया जाए, जिससे दुर्बलता दूर हो सके और स्वस्थ समर्थ मनुष्य की तरह जीवनयापन कर सकना संभव हो सके।
मस्तिष्क विकृत, हृदय निष्ठुर, रक्त दूषित, पाचन अस्त-व्यस्त हो, शरीर के अंग-प्रत्यंगों में विषाणुओं की भरमार हो, तो फिर वस्त्राभूषण की भरमार, अगर-चंदन का लेपन और इत्र-फुलेल का मर्दन बेकार है। वस्त्र आभूषण जुटा देने और तकिये के नीचे स्वर्ण मुद्राओं की पोटली रख देने से भी कुछ काम न चलेगा...
अपने समय का महान आन्दोलन-नारी जागरण
युग सन्धि के इन्हीं बारह वर्षों में एक और बड़ा आन्दोलन उभरने जा रहा है, वह है-महिला जागरण। इस हेतु, चिरकाल से छिटपुट प्रयत्न होते रहे हैं। न्यायशीलता सदा से यह प्रतिपादन करती रही है कि 'नर और नारी एक समान' का तथ्य ही सनातन है। गाड़ी के दोनों पहियों को समान महत्त्व मिलना चाहिए। मनुष्य जाति के नर और नारी पक्षों को समान श्रेय-सम्मान, महत्त्व और अधिकार मिलना चाहिए। इस प्रतिपादन के बावजूद बलिष्ठता के अहंकार ने, पुरुष द्वारा नारी को पालतू पशु जैसी मान्यता दिलाई और उसके शोषण में किसी प्रकार की कमी न रखी। सुधारकों के प्रयत्न भी जहाँ-तहाँ एक सीमा तक ही सफल होते रहे समग्र परिवर्तन का माहौल बन ही नहीं पाया, किन्तु यह अनोखा समय है, जिसमें सहस्राब्दियों से प्रचलित कुरीतियों की जंजीरें कच्चे धागे की तरह टूटकर गिरने जा रही हैं...
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हिन्दी व अंग्रेजी की पुस्तकें
व्यक्तित्व विकास ,योग,स्वास्थ्य, आध्यात्मिक विकास आदि विषय मे युगदृष्टा, वेदमुर्ति,तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ३००० से भी अधिक सृजन किया, वेदों का भाष्य किया।
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