‘वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोक्ता मह्रर्षि अथर्वण के व्यक्तित्व में वैज्ञानिक, दार्शनिक, मनीषी, अध्यात्मवेत्ता, कवि एवं रहस्यवादी के विविध आयामों का एक साथ समन्वय था। उनके अनुसन्धान का क्षेत्र भी विलक्षण एवं सबसे अलग था। वह चेतना की चैतन्यता से पदार्थ की विविधताओं के प्राकट्य एवं पदार्थ की सूक्ष्मताओं में स्पन्दित चेतना की अभिव्यक्ति पर कार्य कर रहे थे। इस कार्य की शुरूआत में अनेकों विशिष्ट विभूतियों ने उन्हें रोका- टोका। आखिर इतने महान् ऋषि होते हुए भी वह क्यों इस अजीबोगरीब अनुसन्धान में अपना समय नष्ट कर रहे हैं। ऋषि के रूप में वह त्रिलोक पूजित हैं। आर्यावर्त के सभी नरेश उन्हें देवों से भी अधिक सम्मान देते हैं। आखिर उन्हें अब और क्या चाहिए? हल्की सी मीठी हँसी हँसते हुए ऋषि अथर्वण ने कहा- ‘‘मैं आत्म सम्मान और आत्मपूजा नहीं बल्कि लोकसेवा का आकांक्षी हूँ। मैं आत्मोपयोगी नहीं लोकोपयोगी अनुसन्धान करना चाहता हूँ।’’
       सचमुच ही इन अद्भुत ऋषि के लिए लोकसेवा ही सब कुछ थी। लोक की पीड़ा से वह पीड़ित होते थे। लोक की व्यथा उन्हें व्यथित करती थी। किसी भी पीड़ा- परेशानी से उनकी आँखें छलक आती थी। मनुष्य हों या पशु- पक्षी सभी उनके अपने थे। मधुमती नदी के तीर पर उनका आश्रम था, जिसे आस- पास के ग्रामों एवं जनपदों के निवासी अथर्वा आश्रम कहते थे। यह आश्रम मधुमती नदी के किनारे विस्तार लिए सघन वन का एक हिस्सा था। ठीक- ठीक यह पता नहीं चलता था कि आश्रम वन का हिस्सा है या फिर वन ही आश्रम का एक भाग है। क्योंकि अथर्वा आश्रम के कुटीर एवं केन्द्र वन में स्थान- स्थान पर थे। आश्रम का मुख्य कुटीर जिसमें मह्रर्षि अपनी पुत्री वाटिका के साथ रहते थे, वह नदी के तट के निकट था। आश्रम के अन्य केन्द्र एवं कुटीर तो पूरे वन प्रान्त में स्थान- स्थान पर थे। इनमें मह्रर्षि के शिष्यगण रहते थे। जो उनके निर्देशानुसार विभिन्न शोधकार्यों में संलग्र थे।
      ये सभी लोकसेवा के लिए संकल्पित थे। मह्रर्षि ने शोधकार्य को एक नया नाम दिया था- ऋषि अर्चन। ऋषि अर्चन से लोकवन्दन- मह्रर्षि और उनके शिष्यों का जीवन मंत्र था। आयु में यद्यपि अब वह वृद्ध हो रहे थे- परन्तु अभी भी उनमें युवाओं सा तेज, बल, उत्साह एवं श्रमशीलता थी। उनकी पुत्री वाटिका ने भी स्वयं को लोकसेवा के लिए अर्पित किया था। वह पिता के कार्यों में निष्ठावान सहयोगिनी थी। अभी कुछ ही दिनों पूर्व मह्रर्षि ने एक निष्कर्ष निष्पादित किया था कि- पदार्थ विघटित होने पर भौतिक एवं सूक्ष्म चेतन ऊर्जा का निःसरण करता है। इसी तरह से ऊर्जा प्रवाह क्रम विशेष में संघनित होने पर विविध प्रकार के पदार्थों की सृष्टि करते हैं। मह्रर्षि का कहना था कि पदार्थों की विघटन की क्रिया में यदि विशेष मुहूर्त में विशिष्ट मन्त्र साधना संकल्प के साथ किया जाय तो वर्षों में पूरा होने वाला कार्य एक दिन में ही सिद्ध हो सकता है। मह्रर्षि सिद्ध मुहूर्त में किए जाने वाले यज्ञ कर्म को पदार्थ विघटन से ऊर्जा प्राप्ति एवं कार्य सिद्धि का सर्वोत्तम उपाय मानते थे।
     ऋषि अथर्वण ने औषधियों, मणियों एवं मन्त्रों पर बृहद् अनुसन्धान कार्य किया था। इसी के साथ विविध वृक्षों, अलग- अलग धातुओं, विभिन्न स्थानों की मिट्टी, जल एवं अन्य पदार्थों पर भी उनके सूक्ष्म- अन्वेषण थे। मह्रर्षि के इस कार्य में यूं तो उनका प्रत्येक शिष्य भागीदार था, परन्तु पुत्री वाटिका, शिष्य क्रतु, कौत्स एवं भृगारि का विशेष योगदान था। ये सभी मह्रर्षि के साथ अपनी भूख- प्यास भूलकर अहर्निश सालों- साल श्रमरत रहे थे। ऋषि अथर्वण के अनुसार उनकी यह समवेत श्रमसाधना महान् फलदायी रही थी। उन्होंने पाया था कि अलग- अलग स्थान के ऊर्जा प्रवाह विशेष होते हैं। इसीलिए इनका विशेष मुहूर्त में विशेष ढंग से प्रयोग करने पर काम भी विशेष होते हैं।
     उन्होंने यह भी जाना था कि समूची प्रकृति में प्रत्येक जीवित या मृत प्राणी, वनस्पति अथवा पदार्थ की विशेष गुणवत्ता है। ये सभी आणविक संरचना के अनुसार ब्रह्माण्ड व्यापी अनन्त ऊर्जा प्रवाहों में किसी खास प्रवाह को ग्रहण करते हैं। उनकी यह ग्रहणशीलता विशेष तिथियों, वारों, योगों, मुहूर्तों में असाधारण ढंग से बढ़ जाती है। रवि- पुष्य, गुरु- पुष्य योग, भौमवती, सोमवती, शनिवासरीय अमावस्याएँ और ऐसे ही अन्य योग व मुहूर्त सम्पूर्ण प्रकृति में अपने अनुकूल- अनुरूप पदार्थ एवं वनस्पत्तियों को असाधारण ढंग से प्राणवान तेजवान बना देते हैं। इसके साथ यदि मन्त्र साधनाएँ एवं समयोचित आचार- विचार का ढंग जुड़ा रहे तो ऊर्जा प्रवाह अतिविशेष हो जाता है। और तब असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में दरिद्रों को धनवान बनाया जा सकता है और मरणासन्न रोगी रोगमुक्त हो सकते हैं। मूढ़ भी इन प्रयोगों से प्रखर प्रज्ञावानों में परिवर्तित हो सकते हैं। इसमें रंच मात्र भी सन्देह नहीं।
    ऋषि अथर्वण ने अपने शिष्य समुदाय के साथ मिलकर अब तक ऐसे असंख्य अनुसन्धान कर डाले थे। उन्होंने और उनके शिष्यों ने अनगिनत कलहपूर्ण दाम्पत्य जीवन में मधुरता घोली थी। न जाने कितने मूढ़ बालकों को प्रखर मेधा सम्पन्न किया था। रोग एवं रोगी में उनके लिए न तो कुछ असाध्य था और न असम्भव क्योंकि मह्रर्षि द्वारा प्रदत्त औषधियाँ, मणियाँ और मन्त्र असम्भव को सहज सम्भव बना देते थे। दीन- दुःखी, पीड़ित प्राणी उनमें अपना तारणहार देखते थे। मह्रर्षि एवं उनके शिष्यों को भी उन पीड़ितों में अपने भगवान् नारायण नजर आते थे। यही कारण था कि ऋषि अथर्वण का आश्रम ही नहीं, बल्कि समूचा वन प्रान्त समूचे आर्यावर्त के ग्रामों एवं जनपदों के निवासियों के लिए तीर्थ, देवालय, चिकित्सालय सब कुछ बन गया था।
    उस युग में मह्रर्षि की यह लोकसेवा अनेकों को न भायी। जिन्हें उनका यह कार्य न भाया उनमें ऐश्वर्यशाली- सम्पदाशाली एवं विभूति- वैभव सम्पन्न लोग भी थे। ऐसे भी थे जिन्हें ज्ञानी एवं तत्त्ववेत्ता कहा जाता था। इनका कहना था कि मह्रर्षि तत्त्व- चिन्तन एवं ऋषि कर्म से विमुख हो गए हैं। उन्हें मह्रर्षि कहना उचित नहीं। ऐसों की बात सुनकर मह्रर्षि कुछ कहते नहीं बस हंस देते। यदि कभी कुछ कहते भी तो केवल इतना ही कि मैं तो अपने अनुसन्धान कार्य से ऋषि अर्चन और लोकवन्दन करता हूँ। मुझे अगर कोई ऋषि न माने तो न सही पर मैं तो ऋषियों और सम्पूर्ण लोक का सेवक हूँ। मह्रर्षि की यह विनयशीलता उनके साथ उनके शिष्यों में भी थी। मह्रर्षि ने अपने समर्पित सेवाभावी शिष्यों से मिलकर प्रकृति के विविध घटकों एवं पदार्थ- प्राणी एवं वनस्पति के स्वरूप, स्वभाव, उनकी भौतिक एवं सूक्ष्म संरचना का गहन अध्ययन किया। साथ ही यह भी पता लगाया कि ये सब कब और कैसे किन योगों- संयोगों में किस तरह के अन्तरीक्षीय ऊर्जा प्रवाहों को धारण- ग्रहण कर प्राणवान बनते हैं। और इनकी लोकोपयोगिता क्या है? मह्रर्षि को उनके युग में भले ही उचित ढंग से न स्वीकारा गया हो; परन्तु यह वेद सत्य है कि उनके द्वारा प्रणीत अथर्ववेद के ५९८७ मन्त्रों में से २६९६ मन्त्र विशुद्ध अथर्वा ऋषि द्वारा दृष्ट हैं। उनकी ऋषि दृष्टि ने स्थूल के सूक्ष्म ऊर्जा स्वरूप को और सूक्ष्म ऊर्जा के पदार्थ रूप का अनुभव किया। ऊर्जा एवं शक्ति के बहुआयामी प्रवाहों की सूक्ष्म अनुभूति ऋषि वाक् ने भी की।

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