गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ—

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

 
यह युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परमपूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं स्नेह सलिला परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी (अखण्ड ज्योति, मार्च १९६४) का साकार होता दिव्य स्वप्न है । यह उनकी तपश्चेतना का आध्यात्मिक प्रकाश है । यहाँ विद्यार्थियों की शैक्षिक आवश्यकताओं के साथ- साथ आध्यात्मिक अभीप्साएँ भी पूरी होंगी । इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के जीवन निर्माण के लिए भरपूर सुयोग और सुअवसर जुटाए गए हैं । यहाँ अध्ययनरत विद्यार्थीगण अपनी उत्तम कल्पनाओं उत्कृष्ट अरमानों एवं श्रेष्ठ स्वप्नों को बड़ी आसानी से साकार कर सकेंगे ।

विश्वविद्यालय के सभी पाठ्यक्रम राष्ट्र के भावी निर्माण को दृष्टि में रखकर बनाए जा रहे हैं, ताकि स्वहित एवं लोकहित के सभी उद्देश्य पूरे हो सकें । यह विश्वविद्यालय न केवल अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए स्वावलंबन एवं रोजगार के अनेक अवसर जुटाएगा, बल्कि देश व संस्कृति के उत्थान एवं विश्व मानवता के कल्याण में इनकी भागीदारी भी सिद्ध करेगा । यहाँ का अध्ययन काल बालकों के जीवन का स्वर्णिम काल होगा । आध्यात्मिक जीवन शैली और तप साधना से विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की न केवल अंतर्निहित शक्तियाँ जाग्रत होंगी, बल्कि वे उनका सार्थक उपयोग भी कर सकेंगे ।

विश्वविद्यालय के संचालकों ने इस विराट योजना के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता न लेने का निश्चय किया है, साथ ही छात्रों से कोई शुल्क लेना भी स्वीकार नहीं किया है । इस अवधारणा से प्रभावित होकर भारत सरकार ने विगत अगस्त माह में श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट शांतिकुंज, हरिद्वार को आयकर की धारा ३५ ए.सी. के अंतर्गत १०० प्रतिशत की छूट का नोटिफिकेशन दिनांक २८ अगस्त ०२ को एस.ओ. ०११५ (ई) जारी किया है । इस धारा के अंतर्गत दिये जाने वाले दान की राशि को दानदाता की कर योग्य आय में से सौ प्रतिशत घटाया जाएगा अर्थात उक्त दान राशि को करदाता की कर योग्य आय में नहीं जोड़ा जाएगा ।

यहाँ जो कुछ अभी हो रहा है और जो भविष्य में किया जाने वाला है, उसे पूरी तरह से बताने में तो शायद ग्रंथों का कलेवर भी कम पड़ेगा । फिर भी कुछ खास बातें इस प्रकार हैं-
साधना संकाय के अंतर्गत प्राचीन ऋषियों, मुनियों, संतों द्वारा की गयी, कही गयी साधना विज्ञान के सत्य को आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन- अध्यापन, शोध एवं शिक्षण का कार्य सुचारु रूप से किया जाएगा ।
मंत्र विज्ञान और योग विज्ञान का व्यावहारिक शिक्षण यहाँ दिए जाने की योजना है ।
हठयोग, राजयोग, लययोग, मंत्रयोग आदि योग की विभिन्न प्रक्रियाओं एवं साधनाओं को आज के युग के अनुरूप सरल, सुरुचिपूर्ण, वैज्ञानिक एवं प्रभावकारी बनाने के लिए विशेष शोध- परियोजनाएँ संचालित की जाएँगी ।
जटिल आदतों, पुराने कुसंस्कारों एवं दुष्प्रवृत्तियों को मनुष्य के अंतःकरण से हटाने- मिटाने के लिए साधना विज्ञान की आसान, किंतु वैज्ञानिक तकनीकों का शिक्षण किया जाएगा ।
मनुष्य की आंतरिक एवं अतींद्रिय शक्तियों के विकास के लिए शोध एवं शिक्षण की व्यावहारिक योजनाएँ लागू की जाएँगी । वैज्ञानिक अध्यात्मवाद एवं सर्वधर्म समभाव पर शोधपरक अध्यापन- शिक्षण होगा ।
स्वास्थ्य संकाय का गठन मनुष्य के संपूर्ण स्वास्थ्य के आदर्श एवं उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाएगा ।
उसमें आयुर्वेद सहित, चुंबक चिकित्सा, फिजियोथैरेपी, योग चिकित्सा एवं प्राण चिकित्सा जैसी अनेकों वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों पर आधारित पाठ्यक्रम चलाए जाएँगे ।
जड़ी- बूटी की व्यापक शोध के लिए देश- विदेश के आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला बनाई जाएगी । शारीरिक एवं मानसिक रोगों के निवारण- निराकरण के साथ उन्हें पहले से ही रोकने के लिए प्रभावी तकनीकों की खोज की जाएगी । चरक एवं जीवक जैसे जन सेवा के लिए समर्पित विशेषज्ञ चिकित्सकों की नयी पीढ़ी तैयार की जाएगी, जो देशवासियों को रोग मुक्त करने के साथ, विदेशों में भारतीय चिकित्सा विज्ञान के गौरव को स्थापित कर सकें ।
शिक्षा संकाय की योजनाओं का दायरा बहुत व्यापक है । इसमें देश की प्राय: समस्त भाषाओं एवं विदेशों की प्रमुख भाषाओं के
शिक्षण की व्यवस्था जुटाई जाएगी, ताकि समूचे देश एवं समस्त विश्व को देव संस्कृति की संवेदना से आप्लावित किया जा सके । देव संस्कृति एवं सनातन धर्म के सभी पहलुओं के शोध एव शिक्षण के साथ विश्व के प्राय: सभी प्रमुख धर्मों में निहित सत्यों एवं सूत्रों की गहन शोध की जाएगी । भावी विश्व के मानव धर्म का प्राकट्य इसी से होना सुनिश्चित है ।
कौटिल्य एवं कुमारजीव की परंपरा में देव संस्कृति के संदेश देने वाले संस्कृति दूतों एवं धर्म शिक्षकों की नयी पीढ़ी का निर्माण किया जाएगा ।
पुरातन विज्ञान एवं आधुनिक विज्ञान के अनेक उपयोगी पाट्यक्रमों को लागू किया जाएगा, ताकि देश की युवा पीढ़ी दर्शन, धर्म, संस्कृति एवं साहित्य के साथ आधुनिक विज्ञान में भी प्रशिक्षित हो सके ।
स्वावलंबन संकाय के द्वारा हताश हो रही युवा पीढ़ी को आशान्वित करने वाली अनेक योजनाओं में नियोजित किया जाएगा ।
ग्राम प्रबंधन, चिकित्सालय प्रबन्धन, देवालय प्रबन्धन विद्यालय प्रबंधन जैसे अनेक नए एवं उपयोगी पाठ्यक्रम लागू किए जाएँगे ।
नयी पीढ़ी में पनप रही दूसरे का सहारा ढूँढ़ने वाली वृत्ति को मिटाकर उनमें आत्मनिर्भरता पैदा करने के लिए शोध एवं शिक्षण की परियोजनाएँ लागू की जाएँगी ।
देश के विभिन्न क्षेत्रों के अनुरूप रोजगार देने वाले पाठयक्रमों एवं परियोजनाओं की व्यवस्था की जाएगी ।
राष्ट्र की युवा पीढ़ी की दशा को सुधारने एवं उन्हें दिशा देने वाले अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम संचालित किए जाएँगे ।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में चलने वाले पाठ्यक्रम
(अ) स्नातकोत्तर उपाधि पाठ्यक्रम
१. एम.ए.एम.एस- सी. नैदानिक मनोविज्ञान ।
२. एम.ए. योग विज्ञान एवं मानव उत्कर्ष ।
३. एम.एस- सी. एप्लाइड योग एवं होलिस्टिक हेल्थ ।
४. एम.ए. पत्रकारिता एवं जनसंचार ।
५. एम.ए. भारतीय संस्कृति एवं पर्यटन प्रबंधन ।
अहर्ताएं- सभी विषयों में प्रवेश पाने के लिए किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक । न्यूनतम ५० प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य है । उपर्युक्त कोर्स हेतु आयु सीमा अधिकतम ३० वर्ष ।

(ब) डिप्लोमा पाठ्यक्रम
१. पी.जी. डिप्लोमा मानवीय चेतना एवं योग चिकित्सा ।
२. पी.जी डिप्लोमा पत्रकारिता एवं जनसंचार ।
अहर्ताएं- उपर्युक्त विषयों में स्नातक/स्नातकोत्तर परीक्षा में कम-से कम ५० प्रतिशत अंक होना अनिवार्य है ।
पी.जी डिप्लोमा कोर्स हेतु अधिकतम आयु ३० वर्ष ।

(स) प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम                                                        आयु सीमा
१. व्यवहार विकृतियों एवं मनोचिकित्सा                  ३० वर्ष
२. धर्म विज्ञान                                                   ३० वर्ष
३. मानवीय चेतना एवं योग विज्ञान                         ३० वर्ष
४. समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन                                      ३० वर्ष
५. एप्लाइड योग एवं हेल्थ                                    ३० वर्ष
६. ग्राम प्रबंधन                                                   ४० वर्ष

अहर्ताएं-
१. मेडिकल ग्रेजुएट (बी.ए.एम.एस./एम.बी.बी.एस.) ।
२. १० +२ न्यूनतम ४० प्रतिशत के साथ उत्तीर्ण ।
३. मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों की स्नातक डिग्री (५० प्रतिशत अंकों के साथ) ।
४. मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों की स्नातक डिग्री (५० प्रतिशत अंकों के साथ) ।
५. १०+२ +३ न्यूनतम ५० प्रतिशत के साथ उत्तीर्ण ।

नोट- मात्र ''धर्म विज्ञान'' एवं ''ग्राम प्रबंधन'' पाठ्यक्रमों के आवेदक के पास यदि ५ वर्ष तक समाज सेवा कार्यों की पुष्टि होती है, तो उन्हें आयु सीमा में ५ वर्ष की छूट दी जाएगी । तब आयु सीमा क्रमश: ३५ वर्ष एवं ४५ वर्ष होगी और केवल ''ग्राम प्रबंधन'' पाठ्यक्रम में प्राप्तांकों का प्रतिशत ४५ तक मान्य होगा ।

(द) पंचवर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स-
स्नातक (३ वर्ष) +स्नातकोत्तर (२ वर्ष)
बी. ए. -निम्नलिखित में से कोई तीन विषय-
१. योग विज्ञान एवं मानवीय चेतना
२. मनोविज्ञान
३. भारतीय संस्कृति
४. अंग्रेजी साहित्य
५. संस्कृति

बी. एस. सी. -
१. योग विज्ञान एवं मानवीय चेतना
२. मनोविज्ञान
३. कम्प्यूटर एप्लीकेशन

अनिवार्य विषय-
१. जीवन जीने की कला (संस्कृति के संदर्भ में)
२. अंग्रेजी कम्युनिकेशन स्किल या संस्कृत ।

अहताएँ-
१.   १०+ २ में न्यूनतम ५० प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण ।
२. आयु सीमा २२ वर्ष अधिकतम ।
३. यदि कोई छात्र बी.ए. /बी.एस- सी. (३ वर्ष का कोर्स सफलतापूर्वक पूरा करने के पश्चात आगे स्नातकोत्तर कक्षा में नहीं पढ़ना चाहता हो तो उसे बी.ए. /बी.एस.सी. की डिग्री दे दी जाएगी) ।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में आरंभ हुआ देव संस्कृति जनसंचार कार्यक्रम
श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार द्वारा संचालित देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा राष्ट्र के सभी वर्गों को देव संस्कृति के महत्त्वपूर्ण सूत्रों से नियमित रूप से जोड़े रखने तथा विभिन्न विषयों पर उपयोगी पाठ्यसामग्री प्रतिमाह घर बैठे उपलब्ध कराने के व्यापक उद्देश्यों के साथ देव संस्कृति जनसंचार कार्यक्रम का शुभारंभ मई, २००६ से किया गया है ।

Related Multimedia

Videos 

View More 



अपने सुझाव लिखे: