पृष्ट संख्या:

सृष्टि का विकास क्रम

यह कार्य ईश्वर के कार्य करने की इच्छा से होता है । इसका प्रारंभिक क्रम यह है कि यह परमाणुओं में प्रारंभ होती है । परमाणु द्रव्य का अंतिम अवयव है, इससे सूक्ष्म अवयव नहीं होते तथा परमाणु नित्य है-पृथ्वी, जल, तेज, वायु के परमाणु होते हैं । सर्वप्रथम इन्हीं परमाणुओं से क्रिया होती है और दो परमाणुओं के संयोग से द्वयणुक उत्पन्न होते हैं । ऐसे ही तीन द्वयणुकों के संयोग से त्रयणुक बनता है, तत्पश्चात् चतुरणुक आदि क्रम से महती पृथ्वी, महत् आकाश, महत् तेज तथा महत् वायु उत्पन्न होता है ।

ईश्वर जगत् का साक्षी है जिसके सन्निधान मात्र से प्रकृति संसार की रचना में प्रवृत्त होती है । चरक के अनुसार-

ज्ञः साक्षीप्युच्यते नाज्ञः साक्षी ह्यात्मा यतः स्मृतः ।
सवेर् भावा हि सवेर्षां भूतानामात्मसाक्षिकाः॥ (च०शा०१/८३)

इस प्रकार प्रकृति और पुरुष के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति होती है, पुरुष का संयोग ही सृष्टि के उदय और संयोग निवृत्ति ही सृष्टि प्रलय का कारण है-

रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवात् ।
ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्ववृद्धया निवतर्ते॥ (च०शा०१/३६)

रजोगुण और तमोगुण के योग से यह चतुर्विंशति राशि रूप संयोग अनन्त है, सत्वगुण की वृद्धि तथा रजोगुण और तमोगुण की निवृत्ति से पुरुष रूप यह संयोग निवतिर्त होकर मोक्ष हो जाता है ।

अर्थात् अव्यक्त से महान्, महान् से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्रा से पंच महाभूत एवं एकादश इन्द्रियाँ इस प्रकार सभी तत्वयुक्त सृष्टि के आदि में पुरुष उत्पन्न होता है । प्रलयकाल में अव्यक्त रूप प्रकृति में बुद्धयादि तत्व लय को प्राप्त हो जाते है ।

इस प्रकार अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त का क्रम रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर पुनः-पुनः उदय प्रलय रूप में चक्र की भाँति घूमता रहता है । यही सृष्टि के विकास अर्थात् उदय महाप्रलय और मोक्ष का क्रम शास्त्र सम्मत है ।

चरक मतानुसार सर्ग क्रम

महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि के प्रारंभ में सवर्प्रथम 'अव्यक्त' तत्व पुनः उसे ''बुद्धि तत्व'' बुद्धि तत्व से ''अहंकार'' उत्पन्न होता है । इसी प्रकार अहंकार से जो त्रिविध होता है, पञ्चतन्मात्राएँ और एकादश इन्द्रियाँ उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार सम्पूर्ण सर्वाङ्ग की उत्पत्ति आदि सृष्टि के आरंभ काल में अभ्युदित होती है । यथा-

जायते बुद्धिरव्याक्ताद् बुद्धयाऽहमिति मन्यते । परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् । ततः सम्पूणर्सवार्ङ्गो जातोऽभ्यदित उच्यते॥ (च०शा०१/६६)

अव्यक्त-(पुरुष संसृष्ट अव्यक्त नाम मूल प्रकृति)
महान् व बुद्धितत्व
अहंकार
सूक्ष्म पञ्चमहाभूत (पञ्चतन्मात्राएँ)
पञ्चमहाभूत
एकादश इन्दि्रयाँ
इन्द्रियाँ पञ्चमहाभूत से युक्त हैं, चरकानुसार पाञ्चभौतिक हैं ।
पृष्ट संख्या:

समग्र साहित्य


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