आयुर्वेद

आयुर्वेद है क्या? एवं इसकी आज के परिप्रेक्ष्य में जन सामान्य के लिए क्या उपादेयता है? तथा क्या आवश्यकता एवं उपयोगिता है?

आयुर्वेद शब्द आयु और वेद इन दो शब्दों के योग से बना है ।। आयु का अर्थ जीवन, और वेद जो विद् धातु से बना है, इसका अर्थ होता है- ज्ञान होना, जानना, विचार करना एवं पाना ।।

सत्तायां विद्यते ज्ञाने वेत्ति विन्ते विचारणे,
विदन्ते विन्दति प्राप्तौ रूपार्था हि विदः स्मृताः ।।
''आयुषो वेदः आयुर्वेदः''

 अर्थात् वेद का अर्थ ज्ञान है, और आयु का ज्ञान जिससे हो, वह आयुर्वेद है । इसका तात्पर्य यह है कि आयुर्वेद आयु से संबंधित समस्त विषयों के ज्ञान का भण्डार है

आयुर्वेद आयु के ज्ञान का भण्डार है ।। वास्तव में ज्ञान का निर्माण होता नहीं, प्रत्युत्तर ज्ञान का सात्विक एवं विमल बुद्धि में प्रादुर्भाव होता है ।।
आयुर्वेद संसार का न केवल प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है, अपितु वह विज्ञान के साथ- साथ जीवन का दर्शन भी है। आयुर्वेद जो मानव के स्वास्थ्य संरक्षण के साथ- साथ व्यापक रूप से उसके जीवन के आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक पक्षों से सम्बन्धित है। जीवन को मौलिक रूप से प्रतिपादित करने की परम्परा प्रारम्भ से ही आयुर्वेदज्ञों की ही रही है ।।

आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद एवं विश्व का आदि चिकित्सा विज्ञान है ।। आयुर्वेद सृष्टि के प्रवाह के साथ प्रवाहित है और इसकी निरन्तरता तब तक रहेगी, जब तक इस धरा पर मानवीय सृष्टि का प्रवाह होता रहेगा, क्योंकि यह पूर्णरूपेण विज्ञान पर आश्रित नहीं, बल्कि शाश्वत, सत्य एवं सदैव अपने में ही परिपूर्ण विज्ञान है ।। जिसका कारण त्रिकालदर्शी भारतीय ऋषियों ने अपने तपोबल से इसका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर प्राणिमात्र की सेवा का लक्ष्य निर्धारित किया है।

सिद्धान्त एवं मूल उद्देश्य-

भारतीय विद्वानों का सर्वसम्मत विचार यह है कि आयुर्वेद की जो कुछ विशेषताएँ हैं, वे मौलिक एवं आधारभूत सिद्धान्तों पर ही आधारित है ।। वही आयुर्वेद की मूल भित्ति या रीढ़ कही गई है ।।
इसका स्पष्ट कारण यह है कि इसके सिद्धान्त एवं मूल उद्देश्य सर्वथा अक्षुण्ण-अपरिवर्तनीय हैं, जो इस प्रकार है-

१- त्रिगुण -- ''सिद्धान्त'' ।।
२- पञ्चमहाभूत
३- त्रिदोष
४- सप्तधातु एवं ओज
५- द्रव्यादि षट् पदार्थ
६- द्रवगत (रसादि पञ्चपदार्थ)
७- आत्मा परमात्मा
८- चरकानुमत चतुर्विंशति एवं सुश्रुत मतानुसार पञ्चविंशति तत्त्व
९- पुनर्जन्म एवं मोक्ष

आयुर्वेद का सिद्धान्त ही रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना एवं स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य को समुचित रूप से बनाये रखना है ।। इसलिए आयुर्वेद को व्यावहारिक रूप देने हेतु उसको कई भागों या अंगों में विभाजित किया गया, जिससे संपूर्ण शरीर का यथावत अध्ययन एवं परीक्षण कर समुचित रोगों की चिकित्सा की जा सके तथा हर दृष्टिकोण से सर्वसुलभ हो सके ।। कालान्तर में आयुर्वेद को जनोपयोगी बनाने हेतु ही उसके आठ अंग किये गये, जो इस प्रकार हैं-

आयुर्वेद के अंग -
१- काय चिकित्सा
२- शालक्य तंत्र
३- शल्य तंत्र
४- अगद तंत्र
५- भूत विद्या
६- कौमारभृत्य
७- रसायन
८- बाजीकरण

इस विभाजन का कारण ही शरीर को उचित आरोग्य प्रदान करना था ।। आयुर्वेद का प्रयोजन मुख्य रूप से धातु साम्य से है, जिसका अर्थ है, आरोग्य उत्पादन करना ।। मानव या प्राणिमात्र सृष्टि के आरंभ से ही अपने हित- अहित का ज्ञान रखता आया है ।। अपनी आयु की वृद्धि और हानि करने वाली वस्तुओं का ज्ञान भी रखता आया है तथा उत्तरोत्तर नवीन- नवीन उपायों का अवलम्बन या अनुसंधान करता आया है ।।
इस प्रकार आयु और वेद दोनों सदैव रहे हैं और रहेंगे ।। अर्थात् आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन (ही मानव मात्र को रोग रहित करना, तथा जो रोगी है, उसके रोगों की चिकित्सा एवं मानव के स्वास्थ्य का संरक्षण करना है ।। अर्थात् ऐसी विद्या का उपदेश जिससे रोग न हो ।) आतुर विकार प्रशमनं तथा स्वास्थ्य रक्षण जो था वह है, और त्रिसूत्र आयुर्वेद के रूप में, प्रथम सिद्धान्त के रूप में प्रचलित हुआ, जिससे रोग का हेतु, लक्षण एवं औषध जानकर रोग का शमन किया जा सके।


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