अपने भाग्य को स्व गढना

 इस पूर्णिमा से जुड़ी दोनों ही कथाएँ बड़ी ही मीठी और प्यारी हैं। आज से २५०० साल पहले, जिस दिन सिद्धार्थ का जन्म हुआ, समूची कपिलवस्तु में उत्सव की धूम मच गयी। पूरा नगर सज गया। रात भर लोगों ने दिए जलाए, नाचे। उत्सव की घड़ी थी, चिर दिनों की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। इसलिए राजकुमार को सिद्धार्थ नाम दिया गया। सिद्धार्थ का मतलब होता है, जीवन का अर्थ सिद्ध हो जाना, अभिलाषा का पूरा हो जाना।
       पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड बाजे बज रहे थे, शहनाइयाँ गूँज रही थी, फूल बरसाए जा रहे थे, महलों में, चारों तरफ प्रसाद बांटा जा रहा था। तभी हिमालय से भागते हुए एक वृद्ध तपस्वी महलों के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। उसका नाम असिता था। नगर वासियों के साथ स्वयं सम्राट उनका सम्मान करते थे। वह अब तक कभी राजधानी न आए थे। स्वयं सम्राट को भी उनसे मिलने के लिए जाना पड़ता था। आज अचानक उन्हें महलों की ड्योढ़ी पर देखकर सभी चकित थे। सम्राट ने आकर बड़े अचकचाए स्वर में उनसे पूछा- हे महातपस्वी, क्या सेवा करूँ आपकी।
       असिता ने उनकी दुविधा का निवारण करते हुए कहा, परेशान न हो शुद्धोधन। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ है, उसके दर्शन को आया हूँ। शुद्धोधन तो समझ ही न पाए। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा महान् वीतरागी उनके बेटे को देखने के लिए आया। वह भागे हुए अन्तःपुर में गए और नवजात शिशु को बाहर लेकर आए। असिता झुके और उन्होंने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पांव उनकी जटाओं में उलझा दिए। असिता पहले तो हंसे, फिर रोने लगे। शुद्धोधन तो हतप्रभ हो गए, वह पूछने लगे, महामुनि आप रोते क्यों हैं?
      असिता ने कहा, तुम्हारे घर में जो यह बेटा आया है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है, अरे यह तो सब तरह से अलौकिक है। कई सदियाँ बीत जाती है, तब कहीं यह आता है। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं, यह तो अनन्त- अनन्त लोगों के लिए समूची मनुष्यता के लिए सिद्धार्थ है। अनन्त जनों के जीवन का अर्थ इससे सिद्ध होगा। हंसता हूँ कि इसके दर्शन मिल गए। बहुत प्रसन्न हूँ कि इसने मुझ बूढ़े की जटाओं में अपने पांव उलझा दिए। मेरे लिए यह परम सौभाग्य का क्षण है। पर रुलाई इसलिए आ रही है कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दसो दिशाओं में इसकी महक उठेगी, तब मैं न रहूँगा। मेरे शरीर छूटने की घड़ी करीब आ गयी है।
        महातपस्वी असिता की यह बात बड़ी अनूठी पर सच्ची है। बुद्धत्व का लुभावनापन ही कुछ ऐसा है। उनकी मोहकता है ही कुछ ऐसी। असिता जीवनमुक्त हो गए, पर उन्हें पछतावा होने लगा, कि काश एक जन्म अगर और मिलता तो इस महाबुद्ध के चरणों में बैठने की, इनकी वाणी सुनने की, इनकी सुगन्ध पीने की, इनके बुद्धत्व में डूबने की सुविधा हो जाती। ऐसे अनूठे पल होते हैं, बुद्धत्व के विकसित होने के। महातपस्वी असिता में भी चाहत पैदा हो गयी कि मोक्ष दांव पर लगता हो लगे, कोई हर्जा नहीं। वह रोने लगे थे उनके पांवों पर सिर रखकर कि सदा ही चेष्टा कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, जीवन के आवागमन से, पर आज पछतावा हो रहा है।
         काल प्रवाह में क्षण, दिवस, वर्ष बीते। और एक बैसाख पूर्णिमा को सत्य का, सम्बोधि का, बुद्धत्व का वही चाँद निकला, जिसकी चांदनी में जीने की चाहत कभी असिता ने की थी। यह पूर्णचन्द्र महातपस्वी शाक्यमुनि सिद्धार्थ के अन्तर्गगन में उदय हुआ। इस बीच अनेकों घटनाएँ काल सरिता में घटकर बह गयीं। शिशु सिद्धार्थ किशोर हुए, युवा हुए, यशोधरा उनकी राजरानी बनीं, राहुल के रूप में उन्हें पुत्र मिला। पर ये तो दृश्य घटनाएँ थी। अदृश्य में भी बहुत कुछ घटा। प्रचण्ड वैराग्य, अनूठा विवेक- जिसकी परिणति महाभिनिष्क्रमण के रूप में हुई। युवराज तपस्वी हो गए। तपस्या से दुर्बल, जर्जर सिद्धार्थ को सुजाता ने खीर खिलायी। और उनकी देह को ही नहीं जीवन चेतना को भी नव जीवन मिला। और वह गौतम बुद्ध हो गए।
       गौतम बुद्ध के रूप में वे ऐसे है जैसे हिमाच्छादित हिमालय। जिससे करूणा की अनेकों जलधाराएँ निकलती हैं। जहाँ से महाकरूणा की गंगा बहती है। जो पतितपावनी, कलिमलहारिणी, सर्वपापनाशिनी है। पर्वत तो और भी है हिमाच्छादित पर्वत भी और है। पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे हैं। पूरी मनुष्य जाति में उनके जैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। उन्होंने जितने हृदयों की वीणा को बसाया है, उतना किसी और ने नहीं। उनके माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम भगवत्ता उपलब्ध की, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।
       बुद्ध के बोल अत्यन्त मीठे हैं, उनके वचन बहुत अनूठे हैं। उनके द्वारा कही गयी धम्म गाथाओं में जीवन के बहुआयामी सच है। प्रत्येक धम्मगाथा एक कथा कहती है और जिन्दगी को राह दिखाती है। इस पुस्तक में इन अनूठी कथाओं को पिरोया गया है। एच.जी. वेल्स ने बुद्ध के सम्बन्ध में एक अद्भुत सच्चाई बयान की। उन्होंने कहा- कि समूची धरती पर उन जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और उनकी तरह ईश्वर शून्य व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है- सो गॉड लाइफ एण्ड सो गॉड लेस। अगर कोई ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकले तो बुद्ध से ज्यादा ईश्वरीय प्रतिभा भला कहाँ मिलेगी? फिर भी सो गॉडलेस- इतना ईश्वर शून्य। ईश्वर शून्यता का अर्थ ईश्वर विरोधी होना नहीं है। जैसा कि कुछ समझदार समझे जाने वाले नासमझों ने समझ लिया है। इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि उन्होंने इस परम सत्य का उच्चार नहीं किया।
        उपनिषद् कहते हैं कि ईश्वर के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना तो कह ही दिया। बुद्ध ने इतना भी नहीं कहा। वे परम उपनिषद् हैं। वह ईश्वर की चर्चा करने वाले केवल नाम मात्र के आस्तिक नहीं हैं। वह तो ईश्वरत्व को उपलब्ध करने वाले महाआस्तिक हैं। अगर परमात्मा के सम्बन्ध में कुछ कहना सम्भव नहीं, तो फिर बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। बस चुप रहकर- इशारा किया। पश्चिम में एक बहुत बड़ा दार्शनिक हुआ है- लुडविग पिटगिस्टाइन। उसने अपनी बड़ी अनूठी किताब ‘टै्रफ्टेटस’ में लिखा है कि जिस सम्बन्ध में कुछ कहा न जा सके, उस सम्बन्ध में बिल्कुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही नहीं चाहिए।
अगर विटगिंस्टाइन ने बुद्ध को देखा होता तो वे अपने कहे हुए सच की अनुभूति कर लेते। अगर विटगिंस्टाइन की बातों को बुद्ध ने सुना होता तो अवश्य मुस्करा देते। बड़े ही प्यार से वे उसके कथन को अपनी स्वीकृति दे देते। पश्चिम के लोगों ने विटगिंस्टाइन को समझने में भूल की। यही भूल पूरब के लोगों को हुई, बुद्ध को समझने में। बुद्ध दार्शनिक और विचारक नहीं, वह रुग्ण मनुश्यता के लिए बड़े ही करूणावान वैद्य थे। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है। पर इतना करूणापूर्ण होकर और इतने सटीक ढंग से नहीं। बड़े ढंग से लोगों ने बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध के कहने का ढंग ही कुछ और है, जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसकी ओर एक बार उन्होंने भर नजर देख लिया, फिर वह भटक न पाया। जिसे उनके बुद्धत्व की थोड़ी सी झलक मिल गयी, उसका समूचा जीवन ही रूपान्तरित हो गया। ‘अप्प दीपो भव’ यही बुद्ध का अन्तिम वचन है। बुद्ध पूर्णिमा के शुभ क्षणों में इसे इस भांति भी स्मरण किया जा सकता है-

महाबुद्ध ने मुझसे- तुमसे,
एक- एक से, हम सबसे
सुनो, यह सत्य कहा,
अपने दीपक आप बनो तुम
तिमिर का व्यूह भेद करना है,
कैसा यहाँ विराम
शिखा को झंझा में पलना है।

Complaining of infirmities, adversities, fate all along, and living an enslaved, maligned, chaotic life, facing its abrupt end with agonizing regret…. Is this all man is destined for? Is there no way out from the entangled illusions, perversion, straying, and blind race? The rishi-munis, the visionary sages, refer the delusions and... See More

A spider weaves a web through the liquid secreted from her mouth; she gets trapped into it and entangles more in her desperate struggle to come out; she succeeds only when she herself gulps it back. A man too creates the web of attachments, untoward actions and effects and sufferings... See More

As far as divine grace is concerned, it is subliminally present for every one. However, it is bestowed only upon those who help themselves, who initiate the endeavors of refining and improving their life on their own. It is said that chance favours only the prepared mind. It is more... See More



अपने सुझाव लिखे: