गायत्री ही कामधेनू है

     


पुराणों में उल्लेख है कि सूर्यलोक में देवताओं के पास कामधेनु गौ है, वह अमृतोपम दूध देती है ।। जिसे पीकर देवता लोग सदा सन्तुष्ट, प्रसन्न तथा सुसम्पन्न रहते हैं, इस गौ में यह विशेषता है कि उसके समीप कोई अपनी कुछ कामना लेकर आता है, तो उसकी इच्छा तुरन्त पूरी हो जाती है ।। कल्पवृक्ष के समान कामधेनु गौ भी अपने निकट पहुँचने वालों की मनोकामना पूरी करती है ।।

यह कामधेनु गौ गायत्री ही है ।। इस महाशक्ति की जो देवता, दिव्य स्वभाव वाला मनुष्य उपासना करता है ।। वह माता के स्तनों के समान आध्यात्मिक दुग्ध धारा का पान करता है, उसे किसी प्रकार कोई कष्ट नहीं रहता ।। आत्मा स्वतः आनंद स्वरूप है ।। आनंद मग्न रहना उसका प्रमुख गुण है ।। दुःखों के हटते और मिटते ही वह अपने मूल स्वरूप में पहुँच जाता है ।। देवता स्वर्ग में सदा आनंदित रहते हैं ।। मनुष्य भी भूलोक में उसी प्रकार आनन्दित रह सकता है, यदि उसके कष्टों का निवारण हो जाए ।। गायत्री कामधेनु मनुष्य के सभी कष्टों का समाधान कर देती है ।।

समस्त दुःखों के कारण तीन हैं-
(1) अज्ञान
(2) अशक्ति
(3) अभाव ।।
इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने से दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा ।।अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है, वह तत्त्वज्ञान से अपरिचित होने के कारण उल्टा- पुल्टा सोचता है और उल्टे काम करता है, तदनुसार उलझनों में अधिक फँसता जाता है और दुःखी बनता है ।। स्वार्थ, भोग, लोभ, अहंकार, अनुदारता और क्रोध की भावनायें मनुष्य को कर्तव्यच्युत करती हैं और वह दूरदर्शिता को छोड़कर क्षणिक क्षुद्र एवं हीन बातें सोचता है तथा वैसे ही काम करता है ।। फलस्वरूप उसके विचार और कार्य पापमय होने लगते हैं, पापों का निश्चित परिणाम दुःख है ।।
दूसरी ओर अज्ञान के कारण वह अपने, दूसरे के सांसारिक गति- विधि के मूल हेतुओं को नहीं समझ पाता ।। फलस्वरूप असम्भव आशायें, तृष्णायें, कल्पनायें, किया करता है ।। इन उल्टे दृष्टिकोण के कारण साधारण- सी, मामूली- सी बातें उसे बड़ी दुःखमय दिखाई देती हैं, जिसके कारण वह रोता- चिल्लाता रहता है ।। आत्मीयों की मृत्यु, साथियों की भिन्न रुचि, परिस्थितियों का उतार- चढ़ाव स्वाभाविक है, पर अज्ञानी सोचता है कि जो मैं चाहता हूँ वही सदा होता रहे, कोई प्रतिकूल बात सामने आवे ही नही, इस असम्भव आशा के विपरीत घटनायें जब भी घटित होती है तभी वह रोता- चिल्लाता है ।।

तीसरे अज्ञान के कारण भूलें भी अनेक प्रकार की होती हैं, समीपस्थ सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, यह भी दुःख का हेतु है ।। इस प्रकार अनेकों दुःख मनुष्य को अज्ञान के कारण प्राप्त होते हैं ।।
< br> अशक्ति का अर्थ है- निर्बलता, शारीरिक मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, आत्मिक निर्बलताओं के कारण, मनुष्य अपने स्वाभाविक, जन्मसिद्ध अधिकारों का भार अपने कंधे पर उठाने में समर्थ नहीं होता, फलस्वरूप उसे उनसे वंचित रहना पड़ता है ।। स्वास्थ्य खराब हो, बीमारी न घेर रखा हो, तो स्वादिष्ट भोजन, रूपवती तरुणी, मधुर गीत वाद्य, सुन्दर दृश्य निरर्थक हैं, धन, दौलत का कोई कहने लायक सुख उसे नहीं मिल सकता ।। बौद्धिक निर्बलता हो तो साहित्य, काव्य, दर्शन, मनन, चिन्तन का रस प्राप्त नहीं हो सकता ।।

आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का परमानंद दुर्लभ है ।। इतना ही नहीं निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का 'उत्तम की रक्षा' सिद्धांत काम करता है ।।

कमजोर को सताने और मिटाने के लिये अनेकों तथ्य प्रगट हो जाते हैं ।। निर्दोष, भले और सीधे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते है ।। सर्दी, जो बलवानों की बल वृद्धि करती है, रसिकों को रस देती है, वह कमजोरों को निमोनिया गठिया आदि का कारण बन जाती है ।। जो तत्व निर्बलों के लिए प्राणघातक है, वे ही बल वालों को सहायक सिद्ध होते हैं ।। बेचारी निर्बल बकरी को जंगली जानवरों से लेकर जगन्माता भवानी दुर्गा तक चट कर जाती है और सिंह को वन्य पशु ही नहीं बड़े- बड़े सम्राट तक अपने राष्ट्र -चिन्ह में धारण करते हैं ।। अशक्त हमेशा दुःख पाते हैं, उनके लिए भले तत्व भी भयप्रद सिद्ध नहीं होते हैं ।।

अभाव जन्य दुःख है- पदार्थों का अभाव ।। अन्न, वस्त्र, जल, मकान, पशु, भूमि, सहायक, मित्र, नध औषधि, पुस्तक, शास्त्र, शिक्षक आदि के अभाव में विविध प्रकार की पीड़ाएँ, कठिनाईयाँ भुगतनी पड़ती हैं ।। उचित आवश्यकताओं को कुचल कर- मन मारकर बैठना पड़ता है और जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षणों को मिट्टी के मोल नष्ट करना पड़ता है ।। योग और समर्थ व्यक्ति भी साधनों के अभाव में अपने को लुंज- पुंज अनुभव करते हैं और दुःख उठाते हैं ।।

गायत्री कामधेनु है जो उसकी पूजा, उपासना, आराधना और भक्तिभावना करता है वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्ध- पान करने का आनंद अभावों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से छुटकारा पाकर मनोवाँछित फल प्राप्त करता है ।।

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