साधना में सफलता के लक्षण

गायत्री साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता, पर भीतर ही भीतर भारी हेर- फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्त्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और मनोमय कोष में जो परिवर्तन होता है, उसकी छाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टीगोचर न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढाँचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर- फेर के चिह्न शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।

सर्प के मांस कोष में जब एक नई त्वचा तैयार होती है, तो उसका लक्षण सर्प के शरीर में परिलक्षित होता है। उसकी देह भारी हो जाती है, तेजी से वह नहीं दौड़ता, स्फूर्ति और उत्साह से वह वञ्चित हो जाता है, एक स्थान पर पड़ा रहता है। जब वह चमड़ी पक जाती है, तो सर्प बाहरी त्वचा को बदल देता है, इसे केंचुली बदलना कहते हैं। केंचुली छोडऩे के बाद सर्प में एक नया उत्साह आता है, उसकी चेष्टाओं बदल जाती हैं, उसकी नई चमड़ी पर चिकनाई, चमक और कोमलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ऐसा ही हेर- फेर साधक में होता है। जब उसकी साधना गर्भ में पकती है, तो उसे कुछ उदासी, भारीपन, अनुत्साह एवं शिथिलता के लक्षण प्रतीत होते हैं, पर जब साधना पूर्ण हो जाती है, तो दूसरे ही लक्षण प्रकट होने लगते हैं। माता के उदर में जब तक गर्भ पकता है, तब तक माता का शरीर भारी, गिरा- गिरा सा रहता है, उसमें अनुत्साह रहता है; पर जब प्रसूति से निवृत्ति हो जाती है, तो वह अपने में एक हल्कापन, उत्साह एवं चैतन्यता अनुभव करती है।

साधक जब साधना करने बैठता है, तो अपने अन्दर एक प्रकार का आध्यात्मिक गर्भ धारण करता है। तन्त्र शास्त्रों में साधना को मैथुन कहा है। जैसे मैथुन को गुप्त रखा जाता है, वैसे ही साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, आलिंगन करती है, तो उसे एक अनिर्वचनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं। जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक- दूसरे में आत्मसात् होते हैं, तो उस स्खलन को ‘समाधि’ कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि- सुख अन्तिम स्खलन है। गायत्री उपनिषद् और सावित्री उपनिषद् में अनेक मैथुनों का वर्णन किया गया है। यहाँ बताया गया है कि सविता और सावित्री का मिथुन है। सावित्री- गायत्री की आराधना करने से साधक अपनी आत्मा को एक योनि बना लेता है, जिसमें सविता का तेजपुञ्ज, परमात्मा का तेज- वीर्य गिरता है। इसे शक्तिपात भी कहा गया है। इस शक्तिपात विज्ञान के अनुसार अमैथुनी सृष्टि उत्पन्न हो सकती है। कुन्ती से कर्ण का, मरियम के पेट से ईसा का उत्पन्न होना असम्भव नहीं है। देवशक्तियों की उत्पत्ति इसी प्रकार के सूक्ष्म मैथुनों से होती है। समुद्र मन्थन एक मैथुन था, जिसके फलस्वरूप चौदह रत्नों का प्रसव हुआ। ऋण और धन (निगेटिव और पोजेटिव) परमाणुओं के आलिंगन से विद्युत् प्रवाह का रस उत्पन्न होता है। तन्त्रशास्त्रों में स्थान- स्थान पर मैथुन को प्रशंसित किया गया है, वह यही साधना मैथुन है।

साधना का अर्थ है- अपने भीतर की श्रद्धा तथा विश्वास की शक्तियों का सम्मिलन कराके एक नई शक्ति का आविर्भाव करना, जिसे सिद्धि, दैवी वरदान या चमत्कार भी कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अपने पास कुछ साधन पहले भी होने आवश्यक हैं। जैसे किसी गन्तव्य स्थान को कोई व्यक्ति किसी भी मार्ग से जाए, रास्ते में खर्च के लिये रुपया- पैसा, खाने- पीने, वस्त्रादि की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही किसी दैवी शक्ति की साधना करने के लिये सद्गुणों, सद्विचारों और सत्कर्मों की आवश्यकता होती है। जिसका जीवन आरम्भ से ही कलुषित, पापपूर्ण और दूषित रहा है, उसकी साधना का सम्पन्न होना असम्भव- सा ही है। इसलिये जो व्यक्ति सच्चे मन से साधना के इच्छुक हैं और उससे कोई उच्च लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको पहले अपने मन, वचन, काया की शुद्धि का भी प्रयत्न करना चाहिये। ऐसा करने पर ही किसी प्रकार की सिद्धि की आशा कर सकते हैं।

आत्मा और परमात्मा का, सविता और सावित्री का मैथुन जब प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध होता है, तो उसके फलस्वरूप एक आध्यात्मिक गर्भ धारण होता है। इसी गर्भ को आध्यात्मिक भाषा में ‘भर्ग’ कहते हैं। ‘भर्ग’ को जो साधक जितने अंशों में धारण करता है, उसे उतना ही स्थान अपने अन्दर इस नये तत्त्व के लिये देना होता है। नये तत्त्वों की स्थापना के लिये पुराने तत्त्वों को पदच्युत होना पड़ता है। इस संक्रान्ति के कारण स्वाभाविक क्रिया- विधि में अन्तर आ जाता है और उस अन्तर के लक्षण साधक में उसी प्रकार प्रकट होने लगते हैं। जैसे गर्भवती स्त्री को अरुचि, उबकाई, कोष्ठबद्धता, आलस्य आदि लक्षण होते हैं, वैसे ही लक्षण साधक को भी उस समय तक- जब तक कि उसकी अन्त:योनि में गर्भ पकता रहता है, परिलक्षित होते हैं। केंचुली में भरे हुए सर्प की तरह वह भी अपने को भारी- भारी, बिंधा हुआ, जकड़ा हुआ, अवसादग्रस्त अनुभव करता है। आत्मविद्या के आचार्य जानते हैं कि साधनावस्था में साधक को कैसी विषम स्थिति में रहना पड़ता है। इसलिये वे अनुयायियों को साधनाकाल में बड़े आचार- विचार के साथ रहने का आदेश करते हैं। रजस्वला या गर्भवती स्त्रियों से मिलता- जुलता आहार- विहार साधकों को अपनाना होता है, तभी वे साधना- संक्रान्ति को ठीक प्रकार से पार कर पाते हैं।

मनुष्य कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य करना चाहे, उसमें किसी न किसी प्रकार की विघ्न- बाधायें, भय- प्रलोभन आते ही हैं, किन्तु जो लोग उनका सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं, वे ही सफलता के द्वार पर पहुँचते हैं। आहार दोष, आलस्य, अधैर्य, असंयम, घृणा, द्वेष, विलासिता, कुसंग, अभिमान आदि के कारण भी साधक अपने मार्ग से भटक जाता है। भ्रष्टाचार, चोरी की कमाई, दूसरे के अधिकार का अपहरण, घोर स्वार्थपरता आदि जैसे दोषों का आजकल बाहुल्य है। वे भी मनुष्य को किसी प्रकार की दैवी सफलता के अयोग्य बना देते हैं। इसलिये जो व्यक्ति वास्तव में साधना को पूर्ण करके सफलता और सिद्धि की आकांक्षा रखते हैं, उनको उसके लिए सब प्रकार के त्याग, बलिदान, कष्ट- सहन आदि के लिए सहर्ष प्रस्तुत रहना चाहिये, जिससे साधना परिपक्व होकर इच्छित फल प्रदान करेगी।

अण्डे से बच्चा निकलता है, गर्भ से सन्तान पैदा होती है। साधक को भी साधना के फलस्वरूप एक सन्तान मिलती है, जिसे शक्ति या सिद्धि कहते हैं। मुक्ति, समाधि, ब्राह्मी स्थिति, तुरीयावस्था आदि नाम भी इसी के हैं। यह सन्तान आरम्भ में बड़ी निर्बल तथा लघु आकार की होती है। जैसे अण्डे से निकलने पर बच्चे बड़े ही लुंज- पुञ्ज होते हैं, जैसे माता के गर्भ से उत्पन्न हुए बालक बड़े ही कोमल होते हैं, वैसे ही साधना पूर्ण होने पर प्रसव हुई नवजात सिद्धि भी बड़ी कोमल होती है। बुद्धिमान् साधक उसे उसी प्रकार पाल- पोसकर बड़ा करते हैं, जैसे कुशल मातायें अपनी सन्तान को अनिष्टों से बचाती हुई पौष्टिक पोषण देकर पालती हैं।

साधना जब तक साधक के गर्भ में पकती रहती है, कच्ची रहती है, तब तक उसके शरीर में आलस्य और अवसाद के चिह्न रहते हैं, स्वास्थ्य गिरा हुआ और चेहरा उतरा हुआ दिखाई देता है; पर जब साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है, तो साधक में तेज, ओज, हल्कापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है, वैसा ही जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि का प्रसव हुआ या नहीं, इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिये जाते हैं—
१- शरीर में हल्कापन और मन में उत्साह होता है।
२- शरीर में एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती है।
३- त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।
४- तामसिक आहार- विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्त्विक दिशा में मन बढऩे लगता है।
५- स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।
६- नेत्रों में तेज झलकने लगता है।
७- किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है, तो उसके सम्बन्ध में बहुत- सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभासित होती हैं, जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती हैं।
८- दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।
९- भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास मिलने लगता है।
१०- शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।

यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का गर्भ पक गया और सिद्धि का प्रसव हो चुका है। इस शक्ति- सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते- पोषते हैं, उसे पुष्ट करते हैं, वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्दमय परिणामों का उपभोग करते हैं। किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं, अपनी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं, उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चात्ताप करना पड़ता है।


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